Saturday, October 8, 2011

Hindi Short Story Dharti By M.Mubin

कहानी धरती लेखक एम. मुबीन


नींद दलबीर की आखों से कोसों दूर थी ।
सोने का समय नहीं था । जिस क्षेत्र मे वह तैनात था उस क्षेत्र से घुसपैटियों और पाकिस्तानी सिपाहियों का सफाया हो चुका था । उनकी बटालियन ने बडी शान से उस चोटी पर तिरंगा लहराया था जिस पर अब तक घुसपैठी, पाकिस्तानी आतंकवादियों का कब्जा था ।
कई दिनों के निरंतर युद्ध से सारे सैनिक थके हुए थे । इसलिए यह तय किया गया था कि कुछ सैनिक पहरा देंगे, शेष आराम करके अपनी इतने दिनों की थकन उतारेंगे ।
इसी आदेश के आनुसार वह अपने खेमे में आकर लेटा था । परंतु फिर भी उसे नींद नहीं आ रही था । नींद न आने के दो कारण थे ।
शायद उनकी इसी मीठी नींद के कारण कब घुसपैठी भरतमता की धरती में घुस आए उन्‍हे पता ही नहीं चल सका और उन्‍हे खदेडने के लिए यह युद्ध छेडना पडा था ।
और दूसरा कारण था सईदखान की लश ।
शाम को वह एक बार फिर अपनी आखों से सईदकी लश देशकर आया था ।
एक बार फिर वह लश सीम से वापस आई थी । पाकिस्तानियों ने उसे अपना सैनिक मनने से इन्कार कर दिया था और उसकी लश भी स्वाीकार नहीं की थी । सईद की लश बर्फ में दबाकर रखी गई थी उसे हर प्रकार से सुरक्षित रखने की कोशिश की जा रही थी वरना आठा दिनों तक किसी लश का सुरक्षित रहना आसंभाव था ।
अब तक तो वह सड गल जाती ।
परंतु काफिन में रखी लश की देखभाल किसी बीमर की तरह की जा रही थी ।
रोजाना उसकी जांच की जाती उसको सुरक्षित रखनेवाले द्रव्य बदले जाते ।
लश की देखभाल करने वाले हर रोज इस आस पर रहते, कि शायद पाकिस्तान की ओर से सईद को अपना सैनिक स्वाीकार करके उसकी लश मंग ली जाए और वह लश उस के गांव जो क़्वेटा के पास था भेज दी जाएं जहा उसका आन्तिम संस्कार हो ।
परंतु ऐसा कुछ नहीं होता था ।
दलबीर स्वयं दिन में कई कई बार जाकर सईद की लश देखता था और कभी कभी तो उसकी लश के पास जाकर घंटो बैठा रहता था ।
आखिर इस युद्ध में सईद उसी के हाथों मरा गया था । सईद उस का दोस्त था । उसने अपने हाथों से अपने दोस्त को मरा था । उसे इस बात का कोई दु:ख नहीं था ।
क़्योंकि उसने अपनी धरती, अपने देश की रश के लिए ऐसा किया था। दोनों दोस्त थे परंतु दो दुश्मन राय्र्ट्रों के सिपाही थे । उन्‍हे एक दूसरे से लहना था । उसे आवसर मिल गया उसने सईद को गोली मर दी और वह मर गया ।
गोली चलते समय उसके मन में यह भावना नहीं थी कि सईद उसका दोस्त है और वह अपने दोस्त की जान ले रहा है ।
उसे तो अपना कर्त्तव्य पूरा करना था । अपने देश अपनी मतॄभूमि की रश करना था । जो नापाक कदम उसकी मतॄभूमि पर पडे थे उन्‍हे खदेडना था और उसने सईद को गोली मर दी ।
यदि वह सईद को गोली नहीं मरता तो सईद उसे गोली मर देता उस पर गोली चलते सईद बिलकुल नहीं झिझकता जिस तरह वह नहीं झिझका था।
क़्यों की सईद की नजर में उस समय वह उसका मित्र नहीं दुश्मन का सैनिक था जो उसके ध्येय के बीच दीवार बना हुआ था और शायद सईद को यही आदेश था कि ध्येय के बीच दीवार बनने वाली हर हस्‍ती को मिटा दो और वह इस आज्ञा का पालन कर रहा था ।
उसे केवल आज्ञा का पालन करना था । वह आज्ञा गलत है या सही उसे इससे कुछ लेना देना नहीं था । गलत या सही तय करने वाले राजनेता होता है । राजनेताओंने यदि कोई गलत आदेश भी दिया तो वह सही होता है वह चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर सकते और यदि इस गलत आज्ञा का पालन करने में उनकी जान भी जाए तो दुनिया की नजर में चाहे वह गलत हो परंतु वे राजनेता तो उसे शहादत का दर्जा करार देकर उसका ढिंढोरा पीटते है शायद उनकी जान की कीमत यही है ।
वे राजनेता इस गलत ध्येय के पीछे अब तक लखों लेगों को मरवा चुके है परंतु उन पिशाचों की प्यास अब भी नहीं बुझ पाई है ।
शिखर पर कब्जा करने के बाद मरनेवालों की लशे जम की गई । शेष तो घुसपैठी, आतंकवादी थे, परंतु चार पांच पाकिस्तानी सैनिक थे । उनके पास से इस बात के प्रमण बरामद हुए थे और सईद खान को तो वह पहचान ही गया था । इस युद्ध में मरने वाले लगों में पांच पाकिस्तानी सैनिक है यह खबर उपर भेज दी गई ।
राजनैतिक स्तर पर इस समचार का प्रचार किया गया ‘‘मरने वाले पांच पाकिस्तानी सैनिकों की लशे इस बात का प्रमण है कि घुसपैटियों की आड में स्वयं पाकिस्तानी सेना इस क्षेत्र में सा#िकय है । यह एक खुले युद्ध की
धमकी है ।’’
इस राजनैतिक बयान के बाद उपर से आदेश आया कि पाकिस्तानी सैनिकों की लशें पाक सेना के हवाले कर दी जाए ।
आदेश आनुसार सीम पर पाक सेना को उनके सैनिकों की लशें देने ले गई ।
लशें ले जाने वालों में दलबीर भी शामिल था । लशों को देखकर उनके गिर्द एक भीड लग गई ।
अरे ‘‘इकबाल’’
‘‘सईद खान’’
‘‘नाजिम’’
‘‘हसरत आली’’
‘‘जमील’’
सैनिकों के मुंह से आवाजें निकली ।
परंतु उन लशो के बारें मे शायद उपर से आदेश आ गया था । आदेश आनुसार कहा गया
‘‘यह हमरे सैनिकों की लशें नहीं है ।’’
इस बात पर पाक सैनिकों ने अपने आधिकारियों को घेर लिया था ।
‘‘सर, यह आप क़्या कर रहें है । बरसों से हमरे साथ है और आप कह रहे है यह हमरे सैनिकों की लशे नही है । आप अपने सैनिकों की लशें लेने से इन्कार कर रहे है ।’’
‘‘मुझे उपर से जो आदेश मिल है मैं उस आदेश का पालन कर रहा हूं ’’ आधिकारी ने उत्तर दिया ।
‘‘यह कैसा आदेश है, देश के लिए शहीद होने वाले शहीदों की लशे ना ली जाएं । उन शहीदों की लशें यह कहकर दुश्मन के हवाले कर दी जाए कि मरने वाले हमरे सैनिक नहीं है । जनाब, मरने वाले सैनिकों का सममन होता है । उनकी लशें इस तरह दुश्मनों को लौटा कर उन लशों की बे हुरमती (अपमान) नहीं किया जाता ।’’
‘‘सैनिक का काम है बालिदान देना और वे सैनिक बालिदान दे चुके है। अब यह उनके बालिदान का एक और प्रकार है कि उनकी लशें वापस नहीं ली जाए उनकी लशें वापस लेने का मतलब होगा इस बातका पक़्का प्रमण देना कि पाकिस्तानी सेना घुसपैठा में शामिल है और इस प्रमण के बाद सारी दुनिया में पाकिस्तान की थूं थूं होगी इसलिए भालई इसी में है कि हम अपने सैनिकों का लशें ना लों । उन्‍हे वापस कर दे ं ।’’
‘लेकिन सरजी हमें ऐसा काम करने के लिए बाध्य क़्यों किया जा रहा है जिसका पता चल जाने के बाद सारी दुनियां में हमरी थूं थूं हो ।’
‘यह सोचना हमरा तुमहारा काम नहीं है । राजनेताओं का काम है । हमरा काम उनकी आज्ञाओं का पालन करना है ?’
और सीम से वे पांच लशें दोबारा वापस एौंकप लई गई । उनमें सईदखान की लश भी थी ।
सईद खान उसकी गोली का शिकार होकर मरा था । उसे उस बात का दुख नहीं था दुख इस बात का था मरने के कई दिनों बाद भी उसकी लश बे कपकन है । उसके देशवासी, जिस देश की सेना के लिए उसने अपनी जान निछावर कर दी वे लेग भी उसे अपनाने के लिए तैयार नहीं है ।
जिस मिटटी से उसने जन्म लिया है क़्या उस मिटटी में वह दपकन हो पाएगा ? या उस किसी दूसरी मिटटी में जगह मिलेगी ?
उसे बार बार याद आ रहा था । एक बार उसने सईद खान से कहा था
‘‘सईद खान, जिस धरती की ओर तुम अपनी आपावित्र नजरों से देखते हो, जिसकी पावित्रता तुम अपने आपावित्र कदमें और इरादों से आपावित्र करने का इरादा रखते हो उस धरती का सीना इतना विशाल है कि समय आनेपर एक दिन यही धरती तुम्‍हें अपनी बाहें पैकलकर अपना लेगी और तुम्‍हें अपनी गोद में जगह दैगी ।’’
आज जब वह सोचता है तो उसे विश्वास ही नहीं होता है कि इतनी जलदी उसकी बात सही सिद्ध हो जाएगी ।
क़्योंकि सईदखान और दूसरी लशों के बारे में पैकसल हो चुका है ।
‘‘हम आखिर कब तक उन लशों को संभालते रहेंगे उपर से आदेश आने के बाद किसी स्वयं सेवी संस्था के हवाले कर देंगे वह उनका आन्तिम संस्कार कर देगी ।’’
‘आंतिम संस्कार’ सोचकर उसके होठोंं पर कडवी मुस्कान पैकल जाती थी । उसे कब्र में दपकन कर दिया जाएगा भरत मता की गोद में वह सिर रखकर हमेशा के लिए सो जाएगा । उस भरत मता की गोद में जिस.... । जहा वह पैदा हुआ वहां की उसे ना तो तीन मुठ्ठाी मिटटी मिल पाएगी और ना दो गज जमीन ।
उसके मित्र, साथी, रिश्तेदार कोई भी उसकी मौय्यत को कांधा नहीं दे पाएंगे वह परायों के कांधो पर सवार होकर अपनी आन्तिम यात्रा के लिए जाएगा। क़्या एक देश पर जान निछावर करनेवाले का ऐसा ही आंत होता है ?
नहीं देश पर जान निछावर करने वालों के लिए तो फूलों के ढेर लग जाते है । वे मिटटी में दपकन नहीं होते । इतिहास बनकर इतिहास के पन्नों पर पैकल जाते है । परंतु वे जो मतॄभूमि की रश करते है । किसी की मतॄभूमि हडपने के लिए जो सईदखान की तह आगे कदम बढाते है शायद उनका आंत सईद खान सा ही होता है....
सईद खान का कहना था
‘‘दलबीर कश्मीर हमरा है, हम लेकर रहेंगे । बचपन से हमरे जेहन मं यह बात डाली गई है । तुमने बांग्लादेश के नाम पर हमरा एक बाजू तोडा है हम कश्मीर के नाम पर तुमहारा आधा सिर काट देंगे ।’’
‘‘सईद, दलबीर जैसे लखों लेगों के सिर कट जाएंगे मगर भरतमता के सिर का बाल भी बांका नहीं होगा ।’’
उसका उत्तर होता था ।
दोनों जब भी मिलते थे इस विषय पर दोनों में झडपे होती थी । परंतु गरम गरम चर्चा और झडपों के बाद भी जब वे एख दूसरे से बिदा होते थे तो हंसते हंसते बिदा होते थे ।
वे दोनों कब एक दूसरे के दोस्त बन गए थे उन्‍हे पता ही नहीं चल था।
इससे पहले वह पूंछ सेक़्टर में था ।
पूरे क्षेत्र में दोनो देशों की सेनाएं आमने सामने थी । रोजाना एक दूसरे पर गोलबारी होती, झडपे होती, और युद्ध सा समं बंध जाता था ।
दोनों देश की सेनाओं के लिए सीम से आधिक युद्ध स्थल वह छोटा सा झरना था जहा पर से दोनों सेनाएं पीने की पानी लेती थी और और उसी में दोनों देशों के सैनिक स्नान इत्यादी भी करते थे ।
झरना नो मेन लॉण्ड मे था दोनो देश उसपर अपना कोई दावा नहीं कर सकते थे ।
यह तय किया गया था कि झरने की पाकिस्तानी सीम से पाकिस्तानी सैनिक पानी लोंगे, भरतीय सीमे से भरतीय सैनिक पानी भरने या स्नान के लिए दोनों सैनिक साथ साथ जाते । आमना सामना होता और जरा जरा सी बात पर झडपें हो जाती । गोलियां और तोपें चलने लगती ।
थककर दोनों ओर के आधिकारियों ने तय किया कि दोनो सेनाएं एक एक दिन झरने से पानी भारेंगी । जब एक सेना की पारी तो हो दूसरी सेना का कोई भी सिपाही वहां नहीं पकटकेगा ।
उस निर्णय के बाद झरने पर रोज रोज होने वाली मरपीट बंद हो गई थी ।
दोनों सेनाएं उस नियम का पालन कर रही थी । एक दिन दलबीर अपने साथियों के साथ झरने पर स्नानकर रहा था कि आचानक उसका एक साथी चींखा -
‘‘ओए पाकिस्तानी सिपाही, जान की खैरियत चाहता है तो यहां से चल जा । आज तुमहारी बारी नहीं हमरी बारी है ।’’
वह हाथ उपर उठाए उनके समीप आया
‘‘मुझे आज गुस्ला (स्नान) की हाजत (आवश्यकता) है । गुस्ला नहीं एिकाय तो नमज नहीं पड सकता । हमरी पारी कल है कल तक गुस्ला नही किया तो मेरी पांच वक़्तों की नमज़े कज़ा (छूट) जाएगी । इसलिए मुझे आज यहां नहाने दों ।’’
उसकी बात सुनकर सबने कुछ सोचा फिर उसने उत्तर दिया
‘‘ठीक है नहा ले ।’’
उसने स्नान कर लिया फिर जाते हुए बोल
‘‘सईद खान तुम लोंगो का यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलेगा ।’’
वह सईद खान से उसकी पहली मुलकात थी ।
फिर मुलकातें होती रही ।
आक़्सर चांदनी रातों में दोनों अपनी अपनी सेनाके एौंकपो से निकलकर दूर किसी टीले पर जा बैफ़्ते और घंटो आपसमें बातें करते थे, अपने अपने परिवार वालों के बारे में ।
उसे मलूम था उसकी पत्‍नी का नाम सूबी है, उसके दो बच्चे है, गरीब मं-बाप है । एक जवान बहन है ।
सईद खान को भी उसके परिवार के बारे में सब कुछ मलूम था ।
दोनों जब मिलते तो पहले एक दूसरे के घरवालों के बारे में ही पूछते।
घरसे पत्र आया है तो उसमें क़्या लिखा है ।
कभी कभी, भरत पाक संबंध, आतंकवाद, कश्मीर के बारे में उनमें गरम गरमी भी हो जाती थी ।
परंतु फिर सामन्य हो जाते थे ।
दलबीर के साथी उसे टोकते भी थे ।
‘‘ओए दलबीरे ...... तुझे क़्या भरतीय सेना में कोई दोस्त नहीं मिल जो एक पाकिस्तानी सैनिक से दोस्‍ती की है...’’
‘‘ओए दोस्‍ती की नहीं जाती, हो जाती है । पता नहीं इस दोस्‍ती में वाहेगुरू की क़्या मर्जाी है ....’’
फिर एक दिन सईद ने बताया
‘‘मेरी एक दूसरी जगह पोस्टाींग हो गई है । कहा मुझे भी नहीं
मलूम । जिंदगी रही तो फिर मुलकात होगी ।’’ सईद चल गया । परंतु वह उसे भूल नहीं सका । महीनों फिर उसकी खबर नहीं मिल सकी और खबर मिलने का कोई स्रोत भी नहीं था ।
महीनों बीत गए ।
फिर कारागिल में लहाई छिह गई और उनकी बटालियन को कारागिल जाने का आदेश मिल ।
उंची उंची काफ़्नि पहाडी ठिकानों पर आतंकवादी, घुसपैठी और पाकिस्तानी सैनिकों ने अपने ठिकाने बना रखे थे । भरतीय सेना एक एक करके उन ठिकानो को वापस कब्जे में लेकर उनको वहां से खदेडने में लगी थी ।
वह आन्तिम शिखर थी जब उसका सईद खान से सामना हुआ ।
उसको उसने दूर से ही पहचान लिया था । परंतु उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सईद खान ही है ।
भरतीय सेना आगे बढ रही थी और चोटी पर डेरा जमए घुसपैटियों के लिए पकरार के रास्ते बंद करती जा रही थी ।
घुसपैटियों को जब लगने लगा कि अब उनका बचना मुश्किल है तो वे भागने लगे ।
परंतु कुछ मुकाबले पर डटे रहे ।
उनमें सईद खान भी था ।
और आखिर सईद खान उसकी गोलीका शिकार हो गया ।
उसने उसकी लश कई बार उलट-पलट करके देखी थी उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह सईद खान ही है ।
परंतु वह सईद खान ही था ।
और अब कई दिनों से उसकी लश बे कपकन व कब्र पडी थी । उसकी सेना उसे अपना सैनिक मनने से इंकार कर रही थी ।
पता नहीं उसके घरवालों को उसकी मौत की सूचना दी गई भी है या नहीं । या उसके मरने का जीवन भर उसके घर वालों को पता नहीं चल सकेगा। उसके घर वालों को यही आश्वासन दिया जाता रहेगा कि सईद खान ठीक है । उसे छुटटी देना संभाव नहीं है और वे जीवन भर उसके वापस आने की राह तकते रहेंगे ।
कल शायद सईद खान भरत की धरती पर इस धरतीमं की गोद में मीठी नींद सो जाएगा । उसे आन्त वही पनाह मिली । जिस धरतीमं को आपावित्र करने के लिए उसके देश के राजनेताओं ने उसे भेजा था ।
काश वे धरती की महानता को समझते तो ऐसा नापाक कदम ना उफ़्ते ।........... द द
अप्रकाशित
मौलिक
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Hindi Short Story Worli Gutter ke Upar By M.Mubin

कहानी वरली गटर के उपर लेखक एम. मुबीन
उस रात समुद्र कुछ ज्यादा ही आक्रोश में था । क्रोधमें भारी लहरें बलखाती उठतीं और आकर गटर की दीवार से अपना सिर पटककर अपने आस्तित्व का आंत कर देती ।
कोई कोई लहर का पानी, या लहर का कोई आंश आकर उसके झोंपडे से टकराता । लकडी की पकलटियों से बनी झोंपडे की दीवार कांप उठती, उसके छेदों से पानी भीतर आकर उसके शरीर से टकराता तो उसके शरीर में एक झुरझुरी सी दौह उठती ।
झोंपडे का पूरा पकर्श पानी से भीगा था । कहीं भी इतना स्थान भी नहीं था कि वह पैर रख सके । उसने पहले ही बिस्तर को समेट कर एक कोने में रख दिया था । और भीगे पकर्श के एक कोने में बैठा कमरे में बढते पानी के स्तर को देख रहा था ।
उसके लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था । साल में कभी कभी तो सैंकडो राते उसे इस प्रकार से गुजारनी पडती थी ।
और विशेष रूप से वर्षा की रातें, आमवस और पूनम की रातें जब समुद्र पूरे उ फान पर होता है । समुद्र का तो ठीक है आनुमन लगाया जा सकता है कि ज्वार भाटा का समय क़्या है और समुद्र किस स्थिति में होगा ।
परंतु गटर के बारे में कोई कैसे आनुमन लगा सकता है ? वह तो कभी भी उबल सकती है, और उसके गंदे पानीका स्तर बढ सकता है । स्तर बढने और गटर उबलने के कारण वह पानी समुद्र में जाने के साथ साथ उसके घर में भी घुस सकता है । यदि समुद्र का सारा पानी भी झोंपडे में भर जाए तो आधिक कळ की बात नहीं थी । ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता था कि खारा पानी शरीर से टकराने के बाद त्वचा में खुजली पैदा करता था और सारे शरीर को खुजाना पडता था और खुजली के स्थान पर नमकीन पानी लगता था तो खुजली की तीव्रता इतनी बढ जाती थी जैसे किसी ने आग पर पेट्रोल डाल दिया हो । परंतु गटर के पानी का घर में घुसने का प्रकोप ही कुछ आलग था । मस्तिष्‍क को फाड देने वाली दुर्गंध में बसा पानी और दुर्गंध भारे गीली मीटटी , और दुर्गंध भारा कीचड जब घर में घुस आता था तो, सापक पानी से धोने के बाद भी दो, दो, तीन, तीन दिनों तक घर से दुर्गंध नहीं निकलती थी । दुर्गंध सहने का तो खैर वह आफ्रयस्त हो चुका था । उसके नथुने अब सुगंध और दुर्गंध का अंतर ही अनुभव नहीं कर पाते थे । उसे अनुभव होता था जिस प्रकार मुंह में थूक रहा है । और उस थूक का एक स्वाद है जो मनव जीवन का एक आंग है उसी प्रकार नत्थुनों में दुर्गंध का रहना भी जीवन का एक रंग है । उसके जीवन का एक आंग गत एक वर्ष से वह यह सब सह रहा था और इन बातों का आफ्रयस्त हो गया था उसके लिए यह कोई आसामन्य बात नहीं थी ।
उसने अपना ठिकाना ऐसे स्थान पर बनाया था जहा ठिकाना बनाने की कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता है ।
वरली गटर के उपर उसका झोंपडा था । वरली की वह एक गटर, जिसमें सारे मुंबई शहर की गंदगी बहकर आती है और समुद्र से मिलती है । गंदगी में तो सभी कुछ होता है । मल, मुत्र, एसीड, सुगंध, दुर्गंध, इतर केमीकल इत्यादी ।
सारी मुंबई का ूकडा, करकट, कचरा हजारों गटरों से बहता, धरती के भीतर ही हजारों प्रकार की केमिकल प्राकिया करता, नए नए पद्यार्थी में परिवार्तित होता उस महागटर तक पहुंचता था जो इसे समुद्र के वश में उंढेल देती थी ।
वरली में इस प्रकार की कई गटरे है, उनमें से कुछ का मुंह केवल समुद्र में खुलता था । परंतु शायद वह एक मत्र ऐसी गटर थी जो पता नहीं कहा से भूगर्फ्रा मर्ग से आती थी परंतु समुद्र से 100 मिटर के लगभाग खुल कर किसी नाले का रूप धारण कर लेती थी और फिर वह नाले के रूप में समुद्र से मिलती थी ।
उस गटर की चौडाई 20 फुट के लगभाग होगी । गटर के दोनों और सिमेंट कां#कीट की दीवारे थीं और दीवारों से दोनों ओर की बिल्डिंग के एंकपाऊंड की उंची दीवारों के बीच, 15, 20 फुट की खाली जगह थी । जो गटर के उबलने से गटर के साथ आई गंदगी से भारी हुई थी ।
मुंबई जैसे महानगर में इतनी बडी खुली जगह, इसकी तो कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता है । परंतु गटर के दोनों ओर की जगह खुली थी और बरसों से खुली थी ।
उस जगह पर ना तो किसी ने कब्जा करके अपना घर बनाया था ना दुकान शुरू की थी ना अपना सामन रखने के लिए गोडावून बनाया था । उस क्षेत्र में इन चीजों के बनाने की कल्‍पना करना तो दूर उस क्षेत्र में प्रवेश करने की कल्‍पना तक कोई नहीं कर सकता था ।
सारी मुंबई की सडांध और दुर्गंध का सहने की शाएिक़्त किसी भी इन्सान में नही थी । परंतु उसने वही झोंपडा बनाकर उस कल्‍पना के परे लगने वाली बात को झुटल दिया था । और वह गत एक वर्ष से रह रहा था इस बीच उसका आनुकरण करके शेष खुली जगह पर किसी ने भी झोंपडा बनाने का साहस नहीं किया था ना किसी ने उसे झोंपडा बनाने पर टोका था ।
उसने झोंपडा बिल्डिंग के एंकपाउंड की दीवार से लगकर समुद्र की दीवार से लगकर बनाया था । गटर की दीवार से 10-15 फुट दूर ।
वहां गटर की दुर्गंध सामन्य दीनों में कम पहुंचती थी । समुद्र की खारी हवाओं के झुक़्कड ज्यादा चलते थे । परंतु गटर जो गंदगी लकर दोनों ओर उंडेल देती थी उस गंदगी से बचना तो आसंभाव सा था । वह उस गंदगी के बीच से लख आने जाने के लिए रास्ता बनाता था । दो-चार घंटे के बाद गटर की नई गंदगी उस रास्ते का स्थान ले लेती थी । उसे उसी गंदगी से आना जाना पडता था ।
वही था जो वहां आता जाता था । दूसरा कोई उस क्षेत्र में प्रवेश करने का दुस्साहस नहीं करता था । जैसे वह एक निषिध क्षेत्र हो और उस क्षेत्र में केवल उसी को प्रवेश करने की आनुमती हो । वह स्थान एक वर्ष पूर्व आचानक एक दुर्घटना के कारण खोज निकाल था ।
दुर्घटना भी सामन्य सी थी ।
एक रात वह अपने दो-चार पारिचितों के साथ फुटपाथ पर सो रहा था। रात के 2 बजे के समीप जब वे सब गहरी नींद में सोए हुए थे आचानक एक पुलिस जीप आई और सिपाही उनपर डंडे बरसा कर उन्‍हे जगाने लगे जो जाग जाता उसे पकडकर जीप में डाल देते ।
दो-तीन डंडे खाने के बाद उसकी भी आंख खुल गई । समीप था कि दो सिपाही पकडकर उसे भी जीप में डालते, खतरे को अनुभव करके वह सिर पर पैर रख कर भागा । सिपाही भी उसके पीछे दौडे । वह सरपट भागा जा रहा था । उसका आनुमन था कुछ दूर उसके पीछे आकर सिपाही वापस चले जाएंगे परंतु सिपाहियों ने भी उस दिन शायद तय कर लिया था कि वे उसे आज हवालत में डालकर ही रहेंगे । इसलिए वे भी उसके पीछे जान तोडकर भाग रहे थे ।
अपने पीछे सिपाहियों का इस प्रकार दौडना उसके मस्तिष्‍क में खतरे की घंटिया बजा रहा था । यदि वह पकडा गया तो सिपाही उन्‍हे इस प्रकार कळ पहुंचाने का बदल जरूर ले ंगे । उसके सारे शरीर पर लफ़्यिों के दाग लगाकर और फिर पता नहीं कौनसा आरोप लगाकर जेल में डाल दे । किसी पर पोटा लगा देना या किसी को इन्काउंटर में मर डालना मुंबई पुलिस का तो बाए हाथ का खेल है । इसलिए आज इनसे बचना बहुत जरूरी है । बस इसी विचार के आते ही वह गटर के बाजू की खाली जगह में घुस गया ।
वहां बहुत अंधेरा था । उसे कोई देख नहीं सकता था । परंतु वहां घुसते ही दुर्गंध का एक तू फान उसके मस्तिष्‍क में घुसा और उसे अनुभव हुआ यह दुर्गंध का तू फान उसके मस्तिष्‍क की धाज्जियां उडा देगा । परंतु एक संभावित खतरे से बचने के लिए वह अपने पैरों के नीचे की गंदगी को रौंदता आगे बढा जा रहा था ।
होश उस समय आया जब समुद्र से एक लहर उफ़्लाती हुई उठी और ‘शडाप’ से किनारे पर बनी दीवार से टकराकर अपने आस्तित्व का आंत कर गई और उसे फ्रिगो गई । ‘बापरे ... आगे तो समुद्र है....’ वह बडबडाया और वही रूक गया ।
उसने पीछे मुडकर देखा । सामने घोर अंधेरा था कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । सिपाही गटर की दुर्गंध सहन ना करके वापस चले गए थे ।
अंधेरे में टटोलकर वह आगे बढा और बिल्डिंग के एंकपाउंड की दीवार से पीठा लगाकर बैठा गया । उसके चारों ओर विचित्र दृश्य था । एक ओर शोर करता समुद्र, उसकी लहरे, और शरीर से टकराता खारा पानी ।
तो दूसरी और गंदगी, गटर से उठती दुर्गंध और दूर दूर तक पैकली हुई गंदगी का ढेर ।
वह दीवार से पीठा लगाए सो गया । आंख खुली तो सूरज चढ आया था। अब उसके सामने हर दृश्य स्पळ था ।
एक और मौजें मरता नील समुद्र, तो दूसरी और सारी मुंबई की गंदगी जम करके लने वाली और उस गंदगी को समुद्र में छोडने वाली वह गटर और उसके चारों ओर पैकली गंदगी और वह दीवार जिस से पीठा लगाकर वह बैठा था ।
सूरज के चढने के साथ दुर्गंध की तीव्रता भी तेज होने लगी और समुद्र की खारी हवा का खारापन भी बढने लगा ।
गंदगी को रौंदता हुआ वह सडक पर आया तो दुर्गंध का बसेरा बना हुआ था । अपने निश्चित स्थान पर आकर उसने पता लगाया तो पता चल कि उसके चार साथी पकडे गए थे । पुलिस आज भी इस स्थान पर छापा मरने वाली है । वह डर गया । रात वह बच गया परंतु आज रात बच नहीं पाएगा ।
उस दिन वह काम पर नहीं गया । दिनभर वह किसी सुरक्षित ठिकाने के बारे में सोचता रहा । दिनभर सोचने के बाद उसे उस गटर से सुरक्षित स्थान और कोई दिखाई नहीं दिया । शाम से पहले उसने अपना सामन उफ़्या और उस गटर की ओर चल दिया ।
रात होने से पहले दीवार से लगकर उसने सापक स फाई करके सोने उठाने बैफ़्ने के योग्य ठिकाना बना लिया था ।
दो-चोर दिन उसके आराम से भी गुजरे और उसने स्वयं को उस वातावरण के आनुरूप ढालने का प्रयत्न भी किया ।
गटर की गंदगी और दुर्गंध का आदी बनना और समुद्र के पानी और हवाओं के थपेडों को सहना । दिनभर वह अपना काम करता था । काम क़्या था यही मजदूरी । रात वहां आकर लेटता तो इतना थका हुआ होता था कि थकान के कारण तुरंत नींद लग जाती थी । रात में एकाधबार आंख खुली तो खुली वरना उसी समय आंख खुलती थी जब पौ पकट जाती थी ।
वह मुंबई के उन लखों लेगों में से एक था जो पेट भरने के लिए मुंबई आए थे किसी काम की खोज में । उन्‍हे काम तो मिल जाता था, पेट भी भर जाता था, परंतु उनके पास सिर छिपाने के लिए कोई स्थान नहीं होता था और वह इधर उधर सोकर अपनी रात गुजार देते थे । परंतु वह भाग्यशाली था उसे सो ने के लिए ठिकाना मिल गया था ।
उसने अपने एक दो साथियों को उस ठिकाने के बारे में बताया तो वे उस पर बरस पडे ‘सरजू तू पगल गया है । उस गंदगी में जाकर सोता है । दुर्गंध से किसी दिन मर जाएगा । स्वयं तो मरने पर उतारू है, हमें भी मरना चाहता है । अरे हम वहां सोना तो दूर कदम भी नहीं रख सकते ।’
इस प्रकार उसके साथ वहां रहने कोई भी तैयार नहीं हुआ ।
इस बीच उसे नए अनुभव हुए । कभी समुद्र की लहर दीवार तक आ जाती और उसे पानी में फ्रिगो देती । तो कभी जब गटर उबलती तो उसका गंदा पानी और गंदगी उसे भी फ्रिगो जाता ।
उनसे बचने के लिए उसने वहां एक छोटी सी झोंपडी बनाने की सोची। कुछ लकडी के टुकडे, प्लास्टिक, बांस इत्यादी उसने जम किए और एक मस के कठोंर पारिढ़ाम से अपने लिए उस स्थानपर एक झोंपडा बना लिया । अब रात या दिन में उसे समुद्र की लहरें फ्रिगों नहीं पाती थी । ना गटर की गंदगी उसके घर के भीतर आ पाती थी । हा कभी कभी गंदा पानी जरू जा जाता था ।
बाजू वाली बिल्डिंग के एक इलेएिक़्ट्रक पोल से उसने वायर जोडकर अपने झोंपडे मे बिजली भी ले ली और एक पंखा भी लगा लिया । बिल्डिंग के एक नल से प्लास्टिक का पाईप जोडकर उसने अपने घर में पानी का प्रबंध भी कर लिया ।
अब ना उसे बिजली की कमी थी और ना पानी की । दिन भर वह अपना काम करता था और रात को आकर सो जाता था ।
फिर एक दिन उसने अपना मेहनत मजदूरी वाल काम भी छोड दिया। क़्योंकि काम तो उसके चारों और बिखरा हुआ था ।
गटर अपने दोनों ओर जो गंदगी पैकल जाती थी उस गंदगी में प्लास्टिक की बोतले, चीजें और पता नहीं क़्या क़्या होता था ।
वह उस गंदगी से वे चीजें जम करता उन्‍हे सापक करके फ्रांगार वालों को बेचता तो उसे आच्छे खासे पैसे मिल जाते थे ।
‘सूरज बाबा’ उसने सोचा ‘जब घर के सामने इतना अच्‍छा काम हो तो फिर काम के लिए इधर उधर भाटकना मुर्खता नहीं तो और क़्या है ।’
परंतु जरूरी नहीं था कि गटर रोजाना अपने साथ जो गंदगी लकर पैकलए उनमे वे चीजे मिले ही । कभी कभी तो सारी पैकलई हुई गंदगी उथल पुथल करने के बाद किसी वस्तु का एक टुकडा नहीं मिलता था । और आंखो के सामने ढेर सा सामन बहते हुए समुद्र में जाता दिखाई देता था ।
उसका भी उसने एक मर्ग निकाल दिया ।
जब भी उसे गटर में कोई बडा सामन बहता हुआ दिखाई देता वह अपनी पीठा को रस्साी बांद कर गटर में ूकद पडता था । गंदगी में तैरना लेग कहते है बडे दिल जिगर का काम है । गंदगी दलदल के समन अपने भीतर हर वस्तु को खेंचती है फिर गंदगी, दुर्गंध, मल, मुत्र ।
परंतु वह तो इन चीजों का आदी हो गया था । उसके लिए सुगंध, दुर्गंध का आस्तित्व ही समप्त हो गया था ।
जहा तक दलदल में डूबने की बात थी कमर में बंधी रस्साी उसे डूबने नहीं देती थी । यह काम उसके लिए बहुत लभाकारी था । क़्योंकि गटर से इस प्रकार उसके हाथ कभी कभी ऐसी चीजें भी लग जाती थी जो हजारों रूपयों में बिकती थी ।
इस प्रकार उसका काम धंदा भी अच्‍छा चल रहा था । नल में 24 घंटे सापक पानी आता था इसलिए गटर से निकलने के बाद जब उस पानी से स्नान कर लेता था तो शरीर से सारी गंदगी दूर हो जाती थी ।
यदि नल नहीं भी आ रहा होता था तोभी कोई समस्या नहीं थी ।
समुद्र की दीवार के पास खडा हो जाता तो बार बार फिर उठाने वाली विद्रोही लहरे स्वयं ही उसे फ्रिगों के उसके शरीर की सारी गंदगी सापक कर देती थी ।
उस रात ठीकसे सो नहीं सका और सवेरे आंख खुल गई । नाश्ता करने के लिए बाहर आया तो फ़्फ़्कि गया । वह स्थान जहा पर गटर भूगर्फ्रा से निकलकर नाले के रूप में समुद्र की ओर बढती थी वहां भीड थी । वह भी भीड में शामिल हो गया ।
दो-तीन टी.वी. के कैमरा मेन भी थे और कुछ नेता टाईप के लेग
थे । टी.वी. वाले गटर के हर कोने से चित्र ले रहे थे कैमरे के लौन्स दुरूस्त करके गटर, और गटर की गंदगी को अच्‍छी तरह अपने कैमरों में कैद करने की कोशिश कर रहे थे ।
एक कैमरा मौन नेता लेगों के भाषण रिकार्ड करा रहा था
‘यह है वह गंदगी का ढेर, वह गटर जो सारे शहर की गंदगी लकर यहां समुद्र में डालती है और समुद्र को प्रदुषित करती है । समुद्र के प्रदूषण का आर्थ है पर्यावरण के संतुलन को बिगाडना और इस संतुलन के बिगडने का आर्थ है धरती का आंत... तो यह सरकार इस धरती के आंत के पीछे लगी है । यह मानवता को धरती से खत्म करने की घिनौनी साजिश है । हमरी मंग है इस घिनौने षडयंत्र को रोका जाए शहर का गंदा प्रदुषित पानी कहीं और डाल जाए। समुद्र को प्रदुषित होने से बचाया जाए इसके लिए हम आंदोलन करेगें । हमें इस आन्दोलन के लिए जनता का सहयोग चाहिए ।
‘‘सभी नेताओं के भाषण हो गए तो किसी की नजर उसपर पडी । पूछने पर जब उसने बताया कि वह गटर के उपर बने उस झोंपडे में रहता है । तो टी.वी. वालों की बांछे खुल गई तुरंत उसे खेंचकर टी.वी. के सामने कर दिया गया ।’’
‘‘यह सरजू जी है जो गत एक वर्ष से इस गटर के उपर रह रहे है इस गटर द्वारा क़्या क़्या गंदगी समुद्र में मिलती है । यह हमें बेहतर तौर पर बता सकते है..’’ उसके बाद टी.वी. वालों ने उस पर प्रश्नो की वर्षा कर दी ।
वह अपनी टूटी फूटी भाषा में उनके प्रश्नो का उत्तर देता रहा ।
जाते समय वे उससे कह गए
‘शाम को टी.वी. देखना तुमहारा भी बयान आएगा’ परंतु वह टी.वी. नहीं देख सका । उसके घर टी.वी. नहीं थी ।
दो तीन दिन बाद पता चल कि हर चैनल उस गटर के बारे में कार्यक्रम दोहरा रहा है नेता लेग के बयान आ रहे है । और कभी कभी उसे भी टी.वी. पर दिखाया जाता है ।
अब आखबार वाले भी जागे । गटर के किनारे कैमरा वालों की भीड सी रहने लगी कोई भीतर घुसने का साहस नहीं करता था । दूर से ही गटर के चित्र लेकर चले जाते थे ।
गटर के बारे में धरने दिए जाने लगे और मेर्चे निकलने लगे ।
विपक्ष ने और कुछ विधायकों ने विधान सभा में इस विषय पर सी.एम.को बुरी तरह घेरा और दो घंटे सदन की कार्यवाही चलने नहीं दी विवश होकर सी.एम. ने बयान दे दिया वे जांच करके इस संबंध में तुरंत निर्णय लोंगे । उन्‍हों जांच का आदेश दे दिया । अब गटर के आरंफ्रिक छोर पर एक मेल सा लग गया था ।
बडी बडी कीमती गाडियां वहां आकर रूकती उनसे कीमती वस्र पहने मेटे ताजे लेग नाक पर रूमल रख कर उतरते । एक उचटती सी द़ष्टि गटर और उसकी गंदगी पर डालते और जाकर सामने की फाईस्टार होटल में बैफ़्कर पता नहीं क़्या बातें करते । कभी कभी सूरज की तरह कोई गंदा आदमी भीतर आता और गटर के नमूने जम करके उन साहबों को दे देता । कभी गंदगी के ढेर से थोडी सी मिटटी लेकर पॅकटों में पैक करके उन्‍हे दे देता ।
यह चीजें प्रयोगशालओ में भेजी जाएगी । और पता लगाया जाएगा इनमें कौनकौनसे तत्व है जो प्रदूषण को बढाते है या जो समुद्राी और मनवी जीवन के लिए हानीकारक है । पूछने पर उसे उस व्‍यक्तिने विजयी आंदाज में बताया ।
क़्या चल रहा था उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । परंतु इस बात का उसे आनुमन हो रहा था उस पर आपकत आने वाली है । इन गटरों को यहां से हटाने के लिए यह आन्दोंलन चल रहा है ।
उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । इन गटरों को यहां से हटाने की बात क़्यों की जा रही है । यह गटरें तो यहां पचासों सालों से है । अब तक किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया । किसी ने आन्दोलन नहीं किया कि यहां से इन्‍हे हटाया जाए ।
अब जब उसने अपना सिर छिपाने के लिए यहां पर एक सुरक्षित ठिकाना बना लिया है इन गटरों को यहां से हटाने की बात की जा रही है और फिर जरूरी नहीं कि इन गटरों से सिर्फ गंदगी ही आए ।
कभी कभी तो इन गटरों से दूध भी आता है । दूध जो सडकों पर दुकानों मे 20 रूपया लिटर मिलता है । परंतु लखों लीटर दूध इन गटरों में बहकर आता है और समुद्र से मिल जाता है । उसने जब इस बारे में एक विद्वान से पूछा था तो उसने बताया था
‘दूध बनाने वाली एंकपानियां दूध की कीमतों को स्थिर रखने के लिए जरूरत से ज्यादा आया दूध गटरों में बहा देती है । यदि वे वह दूध बाजार में बेचे तो ज्यादा दूध के कारण दूध की कीमते गिर जाएगी और उन्‍हे लखों का नुकसान होगा । इसलिए जरूरत से ज्यादा आए दुध को गटरों में बहा दिया जाता है ... भाले गरीबों के बच्चे दूध की एक एक बूंद को तरस्ते रहें....।’
आखबारों और टी.वी. पर उस गटर के बारे में बहुत कुछ आता रहा ।
जब भी कोई आवाज या शोर उठता सी.एम. यह कहकर आवाज दबा देते ।
‘‘हमने गटर की गंदगी और पानी के नमूने प्रयोगशाल में भेजे है उनकी जांच हो रही है जांच के रिपोर्ट आने के बाद इस संबंध में तुरंत कार्यवाही की जाएगी मैं आपको विश्वास दिलता हूं ।’’
रिपोर्ट आ गई ।
रिपोर्ट क़्या थी उसमें यही था कि उस गटर की गंदगी, पानी में कुछ ऐ से जहरीले तत्व भी शामिल है जिससे समुद्र के जीवन को खतरा है । इस रिपोर्ट के आने के बाद पर्यावरण वालों का शोर कुछ ज्यादा ही बढ गया ।
धरने मंत्रालय के साथ साथ गटर के छोर पर भी दिए जाने लगे ।
हर किसीकी आवाज तेज से तेज तर होती जा रही थी जिससे सरकार और सी.एम. के कानों के परदे पकटने लगे ।
घबराकर उन्‍हों घोषणा कर दी ।
‘‘पर्यावरण को बचाया जाएगा । समुद्र के जीवन और पानी को प्रदुषित होने नहीं दिया जाएगा । सरकार 100 करोड खर्च करके उन गटरों पर ऐसे संयत्र लगाएगी जो गंदगी और विय्रैली तत्वको सापक करके शेष पानी समुद्र में छोडेंगे ।’’
100 करोड वाली स्काीम पर कार्य आरंभा हो गया । बडा संयत्र लगाने के लिए जगह की स फाई की गई । गटर के दोनो ओर की गंदगी वापस गटर मे डाल दी गई उसका घर झोंपडा तोड डाल गया ।
अब उसकी जगह गंदगी सापक करने वाल करोडो रूपयों का संयत्र लगने वाल था और सूरज बेघर गटर के किनारे उदास बैठा सोच रहा था अब ठिकाना कहा बनाए ? द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
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Hindi Short Story Azan By M.Mubin

कहानी अज़ान लेखक एम. मुबीन
शायद वह रात का आन्तिम पहर था । नियम के आनुसार आंख खुल गई थी । उसने आनुमन लगाया उस समय शायद चार बज रहे ड़ोंगे । आज आंख नियम से कुछ पहले ही खुल गई थी ।
अब आंख बंद कर के लेटे रहने से भी कुछ मिलने वाल नहीं था । नींद तो आने से रही, सवेरे तक करवटं बदलते रहने से अच्‍छा है बाहर आंगन में बैफ़्कर सवेरे की ठंडी ठंडी हवा के झोकों का आनंद लिया जाए ।
यह सोचकर उसने बिस्तर छोड दिया । चारों ओर आंधकार छाया हुआ था । घर के बाहर आंगण में बंधे पशुओं ने आंधकार में भी उसकी आहट सुनली या उन्‍हों उसकी पारिचित गंध से उसकी उपास्थिती का आनुमन लगा लिया था। वे भी अपनी अपनी भाषा में आवाजे लगाकर उसे अपनी उपास्थिती का आभास दिलने लगे ।
‘अच्‍छा बाबा मुझे पता है तुम लेग जाग रहे हो.. आता हूं’ कहता वह पशुओं के समीप आया ! उसे देखकर गाय ने मुंह से कुछ स्वर निकाल ।
‘‘अब चुप भी हो जा,’’ उसने गाय का सिर थपथपाया तो गाय अपनी जीभा बाहर निकालकर उसका हाथ चाटने लगी उसके बाद भैंसे, भेड, बकारियां शोर लगाने लगी ।
वह एक एक को आवाज देकर उसे चुप रहने के लिए कहता और प्यार से उन्‍हे डांटता ।
थोडी देर बाद सब चुप हो गए तो वह आंगन में रखी खाटपर आकर बैठा गया और तंबाूक निकालकर चिलम भरने लगा ।
चिलम का एक कश लेकर उसने दूर गांव पर एक नजर डाली । अंधेरे मे डूबा गांव उसे किसी भाुतिहा हवेली सा प्रतीत हो रहा था । समय धीरे धीरे सरक रहा था । क़ितीज पर हलकी हलकी ललीम दिखाई देने लगी थी । परंतु वातावरण पर वही सन्नाटा छाया हुआ था । उसके कान इस सन्नाटे को तोडने वाली एक आवाज की प्रतीश कर रहे थे ।
इस मौन के सीने को सबसे पहले चीरने वाली एक आवाज अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज ! परंतु क़ितीज पर पौ पकट गई राम, हनुमन, शंकर, विय्र्णू सभी मंदिरों की घंटियां बजने लगीं । एक साथ बजने वाले उन घंटो ने वातावरण में एक शोर उत्पन्न करके मौन के सीने को चीर कर रख दिया ।
और फिर सब शांत हो गए ।
परंतु ना तो अल्‍लाबख्‍श की आवाज ना वातावरण में उभारी ना उसे अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनाई दी । एक लमबी सांस लेकर उसने अपना सिर झटक दिया ।
वह भी सचमुच बहा मुर्ख है ।
वह यह अच्‍छी तरह जानता है कि अल्‍लाबख्‍श अपने बचे हुए परिवार को लेकर कब का इस गांव को छोहकर जा चुका है ।
जिस मस्जिद के आंगन से वह आज़ान देता था वह खण्डहर बन
गई है । उसके भीतर अब हनुमान की मूर्ति रखी हुई है । फिर भाल उसे अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज किस तरह सुनाई देगी । अब तो अल्‍लाबख्‍श को गांव छोडे महीनों हो गए है । फिर भी उसके कान अल्‍लाबख्‍श की आज़ान सुनने की प्रतीश क़्यों करते है ?
शायद इसलिए कि वे चालीस वर्षो से निरंतर अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनते आए थे । दिन के कोलहल में तो उसे अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनाई नहीं देती थी । परंतु प्रात और शाम की आज़ान हर कोई सापक सुन सकता था । अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनकर उसके मन को बडी शान्ति मिलती थी ।
यह सोचकर कि मेरी तरह मेरा मित्र भी जाग गया है, और अपने परमेश्वर की आराधना में लगा है उस खुदा की आराधना के लिए खुदा के दूसरे बंदों को बुल रहा है ।
चालीस वर्षो में ऐ से बहुत कम आवसर आए थे जब उसने अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज नही सुनी हो ।
उन आवसरों में आधिकतर वे दिन थे जब वह किसी काम से गांव से बाहर गया हो या फिर अल्‍लाबख्‍श किसी काम से घर के बाहर गया हो ।
चालीस वर्षो से वह अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज निरंतर सुन रहा रहा था परंतु वह गत साठा वर्षों से अल्‍लाबख्‍श को जानता था। ऐसा कोई भी दिन नहीं बीता था जब उसका और अल्‍लाबख्‍श का सामना ना हुआ हो । या उसकी और अल्‍लाबख्‍श की बातचीत ना हुई हो या दोनो ने साथ मिलकर तंबाूक ना पी हो ।
परंतु वही अल्‍लाबख्‍श एक दिन उस गांव को छोडकर चल गया जहा वह पैदा हुआ था, जहा वह पल बडा था, जहा उसका घर था, खेत थे वह छोटी सी मस्जिद थी जो उसने अपने हाथो से बनाई थी ।
वह जाते हुए अल्‍लाबख्‍श को रोक भी नहीं पाया था । उसमें अल्‍लाबख्‍श को रोकने का साहस भी नहीं था । वह किस मुंह से अल्‍लाबख्‍श से कहता ।
‘‘अल्‍लाबख्‍श इस गांव को छोडकर मत जाओ यह गांव तुमहारा है...... तुम इस गांव में जन्मो हो । हम सब इस गांव में साथ साथ खेले, पले बडे हुए है.. इस गांव में तुमहारी संतान हुई है । इस गांव के कब्रस्तान में तुम्‍हारे मं-बाप, दादा पता नहीं कितने पूर्वज और रिश्तेदार दपकन है । तुम इस गांव को छोडकर क़्यों जा रहे हो ? इस गांव को छोडकर मत जाओ ....’’
उसे पता था यदि वह यह कहता तो अल्‍लाबख्‍श के पास एक ही उत्तर होता...
‘‘रामजी भाई.. इस गांव ने मेरा जवान बेटा छीन लिया है । इस गांव में मेरा दूसरा बेटा आधमरा आपाहिज हो गया है । इस गांव में मेरी बड़ू की ओर आपावित्र हाथ बढे । मेरी बड़ू ने उन आपावित्र हाथों को अपने शरीर का स्पर्श देने से पहले अपने प्राण त्याग दिए इस गांव में मेरी बेटियों की इज्जत तार-तार होने ही वाली थी पता नहीं किस तरह खुदा ने उसे बचा लिया । इसगांव के मेरे उन खेतों को जलकर राख कर दिया गया जो चार महीनों तक मैंने अपने खून से सींच सींच कर लहलहाए थे । इस गांव में मेरे प्यार के शिवाले मेरे घर को खण्डहर बना दिया गया । मेरी मस्जिद को खण्डहर बनाकर उसमे मूर्तियां रख दी गई अब आगे इस बात की क़्या ग्यारंटी है कि इस गांव मे इसके बाद कभी मेरे बेटों की जान लेने का प्रयत्न नहीं किया जाएगा । मेरी बेटियों की ओर वासनाभारे हाथ नहीं उठेंगे, मेरा आराध्यगॄह उध्वस्त नहीं किया जाएगा ।’’
अल्‍लाबख्‍श की इस बात का तो किसी के पास कोई उत्तर नहीं था ।
उसकी आंखो के सामने सब कुछ हुआ था । उसकी आखों के सामने मस्जिद तोडी गई थी । उसमें हनुमनजी की प्रातिमे रखी गई थी । उसके खेत और घर जलए गए थे । उसके बेटों को त्रिशुलों से छेद छेदकर मरा गया
था । उसकी बड़ू बेटियों की ओर वासनाभारे हाथ बढे थे ।
और वह चुपचाप यह तमशा देखता रहा था । किसी को रोक नहीं सका था गांव के किसी भी व्‍यक्ति ने किसी को भी रोकनेका प्रयत्न नहीं किया था ।
जिन लेगोंने यह सबुकछ किया था वे सब उसके अपने वाले थे । उसी गांव के लेग, नवयुवक थे जो इसी गांव में पल बढकर जवान हुए थे । वे अल्‍लाबख्‍श की गोद में खेले थे । उन्‍हों उसके खेतों से आम चुराकर खाए थे ।
जिसे वे अल्‍लाबख्‍श चाचा कहते थे उन्‍हीं लेगों ने उसके परिवार वालों के साथ यह सब किया था ।
वह और उसके जैसे सैंकडो लेग तमशा देखते रहे थे । और अल्‍लाबख्‍श को सांत्वना देने, अपनी मित्रता और संबंधो का विश्वास दिलने उस समय पहुंचे थे जब उसका सब कुछ लुट गया था । जिस समय दानवता का यह नॄत्य हो रहा था उस समय अल्‍लाबख्‍श गांव में नहीं था वह बाहर गया हुआ था ।
जब वह शहर से लौटा तो इतना सब कुछ हो चुक था ।
यदि अल्‍लाबख्‍श गांव में होता और उसकी आखों के सामने यह कुछ होता तो इतना सबुकछ देखने के बाद शायद वह जिंदा नहीं बचता । या तो वह उसके बडे बेटे की तरह मर दिया जाता या फिर यह सब अपनी आखों से देखने के बाद स्वयं ही मर जाता ।
उसके बाद वह आठा दिनों तक गांव में नहीं रहा वह अपने घायल परिवार को लेकर शहर चल गया ।
शहर से वापस आने के बाद तो उस का गांव में रहना और भी काफ़्नि हो गया उसे धमकियां मिलने लगी ।
‘‘गांव छोडकर चले जाओ वरना पिछली बार जो नहीं हो सका वह इस बार होगा । पिछली बार तो तुम बच गए परंतु इस बार नहीं बच पाओगे ।’’
उस गांव में जन्मो, पल, बडे, अल्‍लाबख्‍श के हजारों दोस्त, जान पहचान वाले उस गांव मे थे । हर कोई उसे जानता था, हर किसी से उसके संबध थे ।
सब अल्‍लाबख्‍श को सांत्वना देने गए
‘जो हुआ बहुत बुरा हुआ’
‘‘यदि वह बुरा हो रहा था तो आप लेगों ने उसे रोका क़्यों नहीं ?’’ अल्‍लाबख्‍श ने उनसे प्रश्न किया तो सब निरूत्तर हो गए । इसलिए जब अल्‍लाबख्‍श ने अपने परिवार के साथ गांव छोडने का निर्णय लिया तो एक दो लेगों ने ही उसे ऐसा करने से रोका । ‘‘मैं रूक जाता हूं परंतु जो धमकियां रोजाना मुझे मिल रही है उनका क़्या होगा? हम इस गांव में पहले की तरह सुरक्षित रहेंगे?’’
‘‘अल्‍लाबख्‍श वे बच्चे है और बहक गए है और कुछ इस तरह बहका दिए गए है कि उन्‍हे राह पर लना काफ़्नि है । और तुम तो जानते हो आजकल के नवजवान किसी की कुछ सुनते नहीं है...’’
इस पर अल्‍लाबख्‍श जवाब देता
‘‘तो इस का आर्थ मुझे अपने परिवार वालों के साथ यह घर छोडना पडेगा । तुम्‍हारे बच्चे नहीं चाहते है हम लेग इस गांव में रहे उस गांव में जो मेरा अपना गांव है और तुम में अपने बच्चों को रोकने की ताकत नहीं है । इस का आर्थ है तुम भी अपने बच्चों के आपराधों में बराबर के साझेदार हो... तो ठीक है अब मैं कोई और खतरा मेल लेना नहीं चाहता... मुझे और मेरे परिवार को कहीं ना कहीं तो शरण मिल जाएगा । अल्‍लाह की जमीन बहुत बडी है...।
जिस दिन अल्‍लाबख्‍श का परिवार गांव छोडकर गया उसके जैसे कुछ लेगों को दु:ख हुआ। परंतु गांव मे उत्सव मनाया गया । अल्‍लाबख्‍श के घर और मस्जिद की इंटे तोड तोडकर अपनी विजय पर नॄत्य किया गया उसके खेतों पर कब्जा करके उसके टुकडे कर दिए गए ।
वह चल गया । परंतु उसके जाने के बाद भी उससे जुडी साठा सालों की यादें नहीं जा सकी ।
वह अल्‍लाबख्‍श जिसके साथ वह बचपन से खेलता, ूकदता आया था जिसके साथ वह गांव की स्‍कूल में पढा था, जिसके साथ वह खेत के संबंध में परामर्श और चर्चा करता था और उसे उन समस्याओं के बारे में अल्‍लाबख्‍श परामर्श देता था । ईद और बकरी ईद के दिन वह जिस के घर शीर खुरम पीने जाता था । मेहर्रम में वह जिसके घर शरबत पीता था और शुद्ध शाकाहारी खिचडा खाता था दिवाली-नवरात्र को जिसे वह अपने घर बुलता था ।
नवरात्र के त्योहार में जब अल्‍लाबख्‍श काठियावाडी वस्र पहेनकर दांडिया खेलता था तो कोई उसे पहचान नहीं पाता था कि यह अल्‍लाबख्‍श है एक मुसलामन जो गांव की इकलौती मस्जिद को मोज्जन (आज़ान देने वाल) और पेशीमम (नमज पढाने वाल) है जो गांव के मुसलामन बच्चो को आरबी पढाता है और धर्म की शिश देता है ।
सवेरे जागने के बाद अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज उसे भाली लगती थी । तो रात में जब तक उसके कानों में उसकी आज़ान की आवाज नहीं पडती उसे नींद नहीं आती थी ।
एक दिन उसने उससे पूछा
‘भाई अल्‍लाबख्‍श तुम इस आज़ान में क़्या पुकारते हो ...’
‘अल्‍लाह की तारीपक और लेगो को अल्‍लाहकी इबादत के लिए आने का बुलवा’
एक दिन उसका लडका शहर से टेप ले आया । वह टेप में सबकी आवाजें रेकार्ड करता था ।
एक दिन जब अल्‍लाबख्‍श उसके घर आया तो वह उससे बोल।
‘अल्‍लाबख्‍श तुम आज़ान पुकारो मैं तुमहारी आज़ान को टेप करना
चाहता हूं’
‘‘नहीं रामजी भाई आज़ान किसी भी समय नहीं दी जाती है। उसका समय निश्चित । उन निश्चित समय पर ही आज़ान की जाती है ।’’
परंतु अल्‍लाबख्‍श से बहुत आधिक जिद करने लगा कि वह उसकी आज़ान टेप करना चाहता है तो उसने आज़ान दी और उसने अल्‍लाबख्‍श की दी आज़ान टेप कर ली ।
‘रामजी भाई मैंने आज तुम्‍हारे घर में आज़ान दी है । इस आज़ान की शाएिक़्त से तुम्‍हारे घर में जो भी भूत, प्रेत, बलएं होगी सब भाग जाएंगी ।’
कुछ दिनों बाद सचमुच उसे अनुभव हुआ उसके घर में कई पारिवर्तन हुए है । उसका घर जिन भूत, प्रेतात्म, बाधाओं से घिरा था उसकी आज़ान से वे दूर हो गई ।
गत साठा सालों में कई बार पूरा देश सांप्रदायिक दंगो की आग से झुलसा परंतु उनकी गरम हवा कभी भी उनके छोटे से गांव को नहीं छू सकी ।
परंतु गत चार पांच वर्षो से वह बडी तीव्रता से अनुभव कर रहा था कि उसकी संतान के विचारों में बडे #कान्तिकारी पारिवर्तन आ रहे है ।
उसकी पीढाी के लेग कभी भी अल्‍लाबख्‍श या उसके धर्म के बारे में बातें नहीं करते थे । परंतु यह नई पीढाी सिर्फ अल्‍लाबख्‍श और उसके समधर्मी भार्ईयों के बारे में उसके धर्म के बारे में बाते करती रहती है । और उनकी बातों में घॄणा का विष भारा होता है ।
गांव का हर छोटा बडा अल्‍लाबख्‍श का सममन करता था परंतु यह पीढाी आवसर मिलने पर बात बात पर अल्‍लाबख्‍श की हदतक विडमबन करने का प्रयत्न करती है । उससे और उसके परिवार वालों से उलझते रहते है ।
कभी कभी वह बडे दु:ख से कहता था..
‘रामजी भाई कुछ समझ में नहीं आ रहा है । गत पचास, साठा सालों में इस गांव में जो मेरे या मेरे परिवार वालों के साथ नहीं हुआ अब हो रहा है ।’
‘छोटी छोटी बातों पर अपना मन छोटा क़्यों करते हो भाई हम है ना यह सब तो चलता रहता है’ वह उसे समझाता और उस दिन वह सब कुछ हो गया, आचानक हो गया, या पहले से तयशुदा था इस बारे में वह कुछ भी नहीं जानता था ।
और अल्‍लाबख्‍श को गांव छोडकर जाना पडा । अब गांव में केवल उसकी यादें और उसके घर के खंडहर की निशानियां शेष है। उसका टूटा हुआ घर, जली हुई मस्जिद जिसमे हनुमन जी की मूर्तिया रखी हुई है । खेत जिस पर पता नहीं कितने लेगो का कब्जा है ।
जिन्ड़ोंने उसके साथ यह सब कुछ किया वे शायद उसे भूल गए हो परंतु वह उसे किस तरह भूल सकता है ।
उसे बार बार अनुभव होता था जैसे अल्‍लाबख्‍श उसकी नस नस में बसा हुआ है । उसे उसकी एक एक बात याद आती है । उसके साथ गुजारा एक एक शण याद आता है । उसे हर जगह उसकी कमी अनुभव होती है ।
पता नहीं उन लेगों को भी अल्‍लाबख्‍श की कमी अनुभव होती भी है या नही । जिन्ड़ोंने उसे गांव छोडने पर विवश किया था ।
उसे गांव छोडने के लिए विवश करके पता नहीं उनकी किस भावना की तुळाी हुई है ।
वह रोजाना जब जागता है तो उसके कान अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज सुनने के लिए व्याकुल रहते है । उसे पता था उन्‍हे उसकी आज़ान की आवाज सुनाई नहीं देगी । क़्योंकि अब अल्‍लाबख्‍श या कोई मियां बश अब इस गांव में नही रहता है फिर भी उसके कान आज़ान की आवाज सुनना चाहते है ।
उसे उसकी आज़ान की आवाज सुनकर एक मनासिक शान्ति मिलती थी ।
परंतु अब जब वह आवाज सुनाई नहीं देती है तो उसे दिनभर एक बेचैनी सी अनुभव होती है ।
जब उसकी व्याकुलता हद से बढ जाती है तो वह टेप रेकार्ड के पास जाता है और उसमें वह कॅसेट लगता है जिसमें उसने अल्‍लाबख्‍श की आज़ान की आवाज टेप की थी । और पूरे वालयूम में जब वह अल्‍लाबख्‍श की आज़ान सुनता है तो उसके मन को बडी शान्ति मिलती है ।
हैया ललपकलह.... हैया ललपकलह....
भालई की और दौडो... भालई की और दौड.... द द
अप्रकाशित
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Hindi Short Story Atank Ka Ek Din By M.Mubin

कहानी आतंक का एक दिन लेखक एम. मुबीन

जब वह घर से निकल तो सबुकछ नित्य के समन चल रहा था ।
बिल्डिंग का वाचमौन उसे देखकर खहा हो गया और उसने उसे सलाम किया । उसने सिर के संकेत से उसके सलाम का जवाब दिया । आगे बढ़ तो एस.टी.डी. बूथ में बैठे साजिद ने उसे सलाम किया । उस दिन उसके झेरॉक़्स, पी.सी.ओ में कुछ ज्‍यादा ही भीड थी और करने वालों की भी लईन लगी हुई थी ।
क़्लासिक आईल डेपो मे बैठे गुड्डो ने भी उसे सलाम किया उसके सलाम का जवाब देता वह सीढियों से नीचे उतरा ।
सामने आलू प्याज बेचनेवाले दुकानदारों की पारिचित शक़्लों और चेहरे दिखाई दिए ! वही रिक्‍शा, हाथगाडी, मेटर साईकल और स्‍कूटरों की रेल पेल और उनके हार्न का शोर ।
उनके बीचसे रास्ता बनाता वह बडी कफ़्न
ईसे आगे बढा ।
बिस्मिलल चिकन सेंटर पर चिकन खरीदने वालों की कतार लगी
थी । एक तख्‍ती पर आज का मूल्‍य लिखा था लटकती, तख्‍ती हवा के साथ गोल गोल घूम रही थी ।
उसके सामने वाली दुकान पर मूल्‍य एक रूपया कम था । सदगुरू होटल के बाहर मिठाई बनाने वाल प्याज़ के पकोडे तल रहा था । बडी सी थाल में वह जलेबियां, वडे और आलू के पकौडे पहले ही तल चुका था ।
गुलजार कोलड्राींक मे एक़्का दुक़्का ग्राहक बैठे शीतपेय का आनंद ले रहे थे ।
बर्फ की गाडी आ गई थी । बर्फ की बडी बडी लदियां उसमें से उतारी जा रही थी । बर्फ लेने वालों की भीड थी । जैसे ही कोई ग्राहक बर्फ की कीमत आदा करता दो आदमी बडी लोहे की कैची मे बर्फ की लदी पकडकर उसे रिक्‍शा में रख आते । मामू आबुजी की दुकान पर दूध लेने वालों की भीड थी । उसके सिरपर दूध के मूल्‍य की तख्‍ती हवा मे घूम रही थी ।
‘तीन रूपया पाव - दस रूपये का एक किले..’ ‘तीन रूपया पाव - दस रूपये का एक किले..’
टमटर बेचने वाले जोजोसे आवाज़ेंलगा रहे थे ।
‘भाई आस्सलम वाले कुम’ आवाज लगाते हुए आनवर और शकील ने नित्य के समन उसे सलाम किया ।
सलाम का जवाब देकर स्वयं को भीह के धक़्कों और नीचे फैले कीचह से बचाता वह आगे बढा । रिक्‍शा कतार में खडे आजीज ने मुस्काकर उसे सलाम किया ।
पुलिस स्टेशन के बाहर कई सिपाही खडे थे और एक सिपाही उन्‍हे उनकी डयूटी का एरिया बता रहा था ।
‘नमस्कार साहब’ एक सिपाही ने उसे सलाम किया ।
‘अरे पोतदार तुम... चले...!’ उसने उससे कहा ।
‘नहीं आज मेरी डयूटी नहीं है, आज शायद कोई दूसरी सिपाही आए....’ सिपाही ने उत्तर दिया ।
मिर्चवालों की दुकान के पास से गुजरते हुए उसे खांसी आ गई ।
उसने खांसी पर नियंत्रण पाया और आगे बढा । संगम ज्वेलर्स की दुकान भी खुल गई थी । राजदीप होटल के काउंटर पर बैठे संदीपने उसे नमस्कार किया और बाहर पूरी भाजी बनाने वाले आदमी को गाली देते हुए उसे जल्‍द आर्डर का मल बनाने के लिए कहने लगा ।
सिनेम की गली से होता वह पोस्ट आफिस तक आया। पोस्ट आफिस के बाहर, मनी आर्डर, रजिस्टर करने वालों की भीड थी ।
सईदी होटल के बाहर दो चार आवारा लडके बैठे आने जाने वालों को छेड रहे थे और आने जाने वाली लडकियों और स्रियों पर भाद्दे शब्द उछल
रहे थे । उन सबसे होता वह समय पर आफिस पहुंच गया । और आफिस के कामें मे लग गया ।
आफिस में उस दिन ज्यादा भीड थी काम का बोझ भी आधिक था ।
एक एक को निपटाते हुए कब दो तीन घंटे बीत गए पता ही नहीं चल सका ।
आचानक उसके एक साथी मोहन को उसके भाई का पकोन आया । पकोन पर बात करने के बाद जब उसे रिसीवर रखा तो उसके चेहरे पर हवाईयां उह रही थीं ।
‘क़्या बात है ?’ उसने मोहन से पूछा
‘‘भाई का पकोन था.. नाके पर किसी वकील को गोली मर दी गई है वह जगह पर ही मर गया - शहर मे भागदड मच गई है... दुकाने बंद हो रही है.. गडबड होने की शंका है । मेरे भाई ने कहा है कि मैं आफिस से आ जाऊं ।’’
यह बात सुनकर उसके मथे पर बल पड गए । उसने प्रश्नपूर्ण द़ष्टि से बॉस की और देखा ।
‘मैं पकोन लगाकर पूरी जानकारी का पता लगाता हूं ।’ कहते हुए बॉस ने रिसीवर उफ़्या दो तीन नंबर डायल करके झललकर रिसीवर रख दिया ।
‘‘टेलीपकोन डेड हो गया है ...’’
थोडी देर बाद चपरासी भी वापस आ गया । वह किसी काम से बाहर गया था ।
‘क़्या हुआ जाधव ?’ उसने पूछा
‘कुछ समझ में नहीं आ रहा है - पूरे शहर में भागदड नची हुई है । किसी वकील को गोली मर दी गई है । दुकाने बंद हो रही है... लेग घबराहट में उधर उधर भाग रहे है... पता चल है कि रिक्‍शा और गाडियों पर पथराव किया जा रहा है... मेरी आखों के सामने चार-पांच कांच फूटी रिक्‍शा आई है ... सबसे ज्यादा लपकडा नजराना के पास है...’
‘नजराना’ ! यह सुनते ही बॉस के चेहरे पर हवाईयां उडने लगी । ‘‘मेरी बेटी इस समय वहां पर टयूशन के लिए गई होगी ।’’
और वह घबराकर रिसीवर उफ़्कर फिर नंबर डायल करने लगा ।
संयोग से टेलीपकोन लग गया ।
‘‘मीना कहा है ? टयूशन के लिए गई है ? टयूशन का समय तो खत्म हो गया है... वह अभी तक वापस क़्यों नही आई ? सुना है उस क्षेत्र में बहुत गडबड चल रही है । तुरंत किसी को भेजकर उसे टयूशन क़्लास से ले आओ..’’ कहते उसने टेलीपकोन का रिसीवर रख दिया ।
परंतु उसके चेहरे पर चिंता के भाव थे । उसके बाद उसने घर टेलीपकोन लगाकर स्थिती का पता लगाने का प्रयत्न किया तब तक टेलीपकोन डेड हो गया था ।
आफिस से बाहर झांका तो सारी दुकानें बंद हो गई थीं । सडके सुनसान हो गई थीं । सडकों पर कोई वाहन, सवारी, दिखाई नहीं दे रही थीं । लेग दो-दो चार-चार की टोलियां बनाकर आपसमें बातें कर रहे थे ।
‘‘क़्या किया जाए ?’’ उसने बॉस से पूछा ।
‘‘आफिस बंद कर दिया जाए?’’
‘‘बिलकुल बंद कर दिया जाए । जलदी से बाकी बचे काम निपटा ले’’ बॉस ने कहा और फिर घर टेलीपकोन लगाने का प्रयत्न करने लगा ।
‘जाधव सामने के नसीम से मेबाईल ले आओ शायद उससे कोई संपर्क हो जाए’ बॉस ने चपरासीसे कहा ।
जाधव ने मेबाईल नहीं लया स्वयं नसीम मेबाईल लेकर आ गया ।
‘‘साहब सारे टेलीपकोन डेड हो गए है.. मैं भी कई स्थानों पर पकोन लगाने का प्रयत्न कर रहा हूं । आपको कौन सा नंबर लगाना है?’’
बॉस ने नंबर बताया नसीम ने नंबर लगाने की कोशिश की परंतु नंबर नहीं लग सका ।
‘लगता है सारे शहर के टेलीपकोन बंद कर दिए गए है ।’
सब काम समप्त करने में लग गए । उसने दो तीन बार घर टेलीपकोन लगाने का दोबारा प्रयत्न किया । संयोग से एक बार टेलीपकोन लग गया ।
‘क़्या स्थिति है ?’ उसने पूछा
‘‘यहां बहुत गडबड है सारी दुकानें बंद हो गई है । सड़क की दोनों ओर हजारों लेगों की भीड है जो एक दूसरे के विरोध में नारे लगा रहे है । मामला कभी भी बिगह सकता है ।’’
‘‘मैं घर आऊं ?’’ उसने पूछा ।
‘‘घर आने की मूर्खता मत करना सारे रास्ते बंद है । रास्तों पर लेगों की भीड है और जोश और क्रोधमें भारी भीड कभी भी कुछ भी कर सकती है । आप जहा है वहीं रहें । जब परिस्थिती सामन्य हो जाए तो घर आ जाना वरना आने की कोई जरूरत नहीं । आफिस के आसपास आपके बहुत से मित्र है । किसी के भी घर रूक जाईए और मुझसे संपर्क बनाए राखिए ’’ पत्‍नी ने उत्तर दिया ।
उसने रिसीवर रख दिया ।
आफिस बंद करने की तैयारी हो गई थी ।
मेहन का भाई स्‍कूटर लेकर आ गया ।
‘‘चले मैं चलता हूं’’ मेहन बोल ।
‘‘सूनो’’ उसने मेहन को टोका ‘‘पुराने पुल के रास्ते नहीं जाना... वहां खतरा है ।’’
‘‘नहीं मैं नए पुल के रास्ते जाऊंगा’’ मेहन बोल साहब और जाधव भी आफिस बंद करके जाने की तैयारी कर रहे थे । उनके घर आफिस के समीप थे ।
‘‘तुम क़्या करोगे ?’’ बॉस ने पूछा ।
‘‘पत्‍नी को पकोन किया था वह कहती है मैं घर आने की मुर्खता ना करूं । सारे रास्ते भीड से भारे है... लेगों के हाथों में हाथियार है। पथराव हो रहा है । रास्ते में कुछ भी हो सकता है । मैं जिन रास्तों से होकर घर जाता हूं वहां तो बहुत ज्यादा तनाव है । फिर उन रास्तों का हर व्‍यक्ति मुझे पहचानता है । जरा सी गडबडकी स्थिति में मेरी जान को खतरा पैदा हो सकता है ... ।’’
‘‘तो मेरे घर चले । परिस्थिति सामन्य हो जाए तो अपने घर चले जाना ।’’ बॉस ने कहा ।
‘‘नहीं मैं यहां रूकता हूं यदि जरूरत पडी तो आपके घर आ जाऊंगा।’’
आफिस बंद कर दिया गया ।
बास और जाधव चले गए ।
वह आफिस के सामने खडा होकर सुस्ताने लगा ।
उसी समय सामने से मुस्‍तफा आता दिखाई दिया ।
‘मुस्‍तफा क़्या बात है ?’ उसने पूछा ।
‘आपसे मिलने ही आ रहा था जावेद भाई । पूरे शहर में गडबड चल रही है आपकाघर जाना ठीक नहीं है । चालिए मेरे घर चालिए । रात में भी मेरे घर रूक जाईए । मैंने भाभी को पकोन किया था । भाभी ने कहा है मैं आपको घर आने ना दूं । अपने घर रोक लूं वहां बहुत गडबड है ।’
वह बातें करता मुस्‍तफा के साथ उसके घर की ओर चल दिया ।
‘गडबड आरंभा किस तरह हुई ?’
‘‘पता नहीं, वह वकील शहर के चौराहे से होता कोर्ट जा रहा था । आचानक दो मेटर साईकल सवारों ने उसे रोककर उसके सिर में गोली मर
दी । वह वहीं ढेर हो गया । होगी कोई पुरानी दुश्मनी या गेंगवार का चक़्कर... वैसे भी वह वकील कापकी काले कामें में शामिल था और कापकी बदनाम था । परंतु एक राजनैतिक पक्ष के केस भी लडता था । इसलिए उस पक्ष ने पहले राजनैतिक और फिर सांप्रदायिक रंग दे दिया ।
दुकाने बंद कराई जाने लगीं । दुकाने बंद ना करने वाले दुकानदारों को मरा पीटा जाने लगा । रिक्‍शा की कांचे पकोडी गई, रिक्‍शा उलटी कर आग लगा दि गई । विशेष रूप से दाढी वाले रिक्‍शा ड्राईवरों को निशाना बनाया जाता ।’’ क्रोधसे उसने अपने होठ भींचे ।
‘‘यह भी कोई तरीका है सामन्य सी बात है । निजी दुश्मनी या किसी और कारण से एक साधारण व्‍यक्ति की हत्या हुई होगी उसे तुरंत राजनैतिक और सांप्रदायाकि रंग देकर शहर की शान्ति भंग की जाए और नागारिकों की जान व मल से खेल जाए ...’’
दोपहर का भोजन उसने मुस्‍तफा के घर किया ।
एक दो बार उसने घर पकोन लगाने का प्रयत्न भी किया परंतु पकोन बंद होने के कारण संपर्क स्थापित नहीं हो सका ।
एक घंटे के बाद आचानक संपर्क स्थापित हो गया ।
‘‘यहां बहुत गडबड है । पत्‍नी बताने लगी ।’’ ‘‘हम बिल्डिंग की टेरिस पर गए थे । आसपास हजारों लेग जम है । वे आक्रमण करने की तैयारी कर रहे है । सामने वाली मस्जिद पर पथराव हो रहा है । इस्लामी होटल पर पथराव किया गया था और उसे लूटने और जलने की कोशिश की गई थी । परंतु होटल की गली में हजारों लडके जम हो गए थे उन्‍हों उत्तर में पथराव किया तो आक्रमणकारी भाग गए परंतु दोनों ओर से भाडकीली नारे बाजी जारी है । स्थिती कभी भी बिगड सकती है । आप इस ओर आने की बिलकुल मुर्खता ना करे । मुस्‍तफा के घर ही रूक जाए ...’’
‘देखो यदि तुम्‍हें बिल्डिंग पर खतरा अनुभव हो तो बच्चों को लेकर अपने मयके चली जाना ।’
‘यूं तो बिल्डिंग को खतरा नहीं है । परंतु जिस प्रकार सामने हजारों लेगों की भीड जम हो रही है कभी भी कुछ भी हो सकता है, ऐसा कुछ हो इससे पहले ही मैं अपने बच्चों के साथ मयके चली जाऊंगी ।’ पत्‍नी बोली ।
पत्‍नी का मयका ज्यादा दूर नहीं था । घर सुरक्षित रास्तों पर था । इसलिए उसे इस बात का संतोष था । पत्‍नी समय आने पर आराम से बच्चों को लेकर मयके चली जाएंगी जो कापकी सुरक्षित है। परंतु अपने घर का क़्या ?
कुछ गडबड हुई तो उसे लूटने और जलने से कौन बचा सकता है ?
उन्‍हे वह मकान लिए आठा महीने भी नहीं हुए थे । सारी जीवन की कमई, बँक से कर्ज, जेवरात बेचने के बाद उन्‍हों वह मकान लिया था और धीरे धीरे उसमें जरूरत की हर चीज सजाई थी। यदि वह घर लूट लिया गया ! या जल दिया गया तो ?
उसका दिल तेजी से धडकने लगा और मथे पर पसीने की बूंदे उभर आईं...
मुस्‍तफा ने टी.वी. चालू किया ।
टी.वी. के हर चैनल से शहर में होनेवाले हंगामें की खबरें आ रही थी।
‘‘शहर में एक वकील की हत्या के बाद एक राजनैतिक पक्ष के कार्यकर्ताओं का हंगाम, पथराव,तोडपकोड....’0ं खबरों में पहले उस वकील का संबंध उस पक्ष से इस हद तक बताया गया कि वह उस पक्ष के लिए केस लडता था ।
फिर समचार में उस वकील को उस पक्ष का कार्यकर्ता बताया जाने लगा ।
और आंत में उसे उस राजनैतिक पक्ष का अध्‍यक्ष बना दिया गया ।
‘‘एक राजनैतिक पार्टी के अध्‍यक्ष एक वकील की हत्या के बाद शहर में सख्त तनाव, पथराव की घटनाएं, दुकानें लूटने और छुरे बाजी की वारदाते... आमेल काटेकर नामक एक व्‍यक्ति को मार मार के लेगों ने आधमरा कर दिया... श्री प्रोवीजन नामक दुकान को आग लगा दी गई । महादेव मेडिकल लूट ली गई।’’
जैसे समचार हर चैनल देने लगा और उसे सुन सुनकर तनाव और हिंसा बढने लगी । स्थिती गंभीर होती जा रही थी । उसका मन डूब रहा था ।
उसे लगा शहर बारूद का ढेर बन चुका है और अब वह फटा
चाहता है ।
आंखो के सामने गुजरात के दंगो के चित्र और समचार नाच रहे थे ।
लेगों को जिंदा जलया जाना... चुन चुनकर लेगों को मरना... उनकी संपती भंग करना, उनके घरों, पूजा स्थले को मंदिरों में पारिवार्तित करना।
उसका मन डूबने लगा और आखों के सामने आंधकार सा छाने लगा क़्या हमरा यही भाग्य बन गया है ?
बाहर लेगों की भीड टोलियों के रूप में जगह जगह जम हो रही थी । हर कोई प्लान बना रहा था । यदि दंगा आरंभा हो तो क़्या किया जाए कुछ बचाव की तरकीबें सोच रहे थे तो कुछ लूटमर का प्लान बना रहे थे । तो कुछ प्रातिकात्मक आक्रमण के लिए रणानिती तय कर रहे थे ।
जो लेग उस स्थान को असुरक्षित अनुभव कर रहे थे उस स्थान को छोडकर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे थे ।
कुछ स्थानों पर पुलिस का नाम व निशान भी नहीं था तो कुछ स्थानों को पुलिस छावनी बना दिया गया था । ऐसा कुछ लेगों की सुरक्षा के लिए किया गया था । तो कुछ क्षेत्र के लेगो को आजाद छोड दिया गया था । वे जो चाहे कर सकते है उनको रोकने वाल कोई नहीं है । तो कुछ क़ोत्रों को इस प्रकार सील कर दिया गया था कि वहां पंछी भी पर नहीं मर सकता था । और वह कुछ नहीं कर सकते था । शहर से नापसंद घटनाओं के समचार निरंतर आ रहे थे।
हर समचार के बाद ऐसा अनुभव होता था स्थिति गंभीर से गंभीर होती जा रही है । तनाव और हिंसा जारी है ।
उसने कई बार घर पकोन लगाने का प्रयत्न किया परंतु संपर्क स्थापित नहीं हो सका । जिसके कारण उसकी चिंता बढती जा रही थी । पत्‍नी घर में अकेली है उसे मयके जाने के लिए कहा था । पता नहीं वह मयके गई भी है या नहीं ?
उसे मयके चले जाना चाहिए । परंतु वह मयके नहीं जाएगी। घर में जो जान अटकी है ।
इतनी कठनाईयों से उन्‍हों अपना घर बनाया है । घर की एक एक चीज में अपना खून पसीना लगाया है । घरकी हर ईंट में उनके आरमन सपने चुने हुए है । भाल वह उस घर को छोडकर किस तरह जा सकती है ?
उसे भाय है - उसके यह सारे अरमान से सपने जलकर राख ना कर दिए जाए । यदि वह ऐसा सोच रही है तो यह उसकी मूर्खता है यदि वह घर में रही तो ना घर बचा सकेगी और ना अपने आप और बच्चों क बचा सकेगी ।
एक निर्बल स्‍त्री भाल अपने आपको किस तरह बचा सकती है? हजारों घटनाएं उसके मस्तिष्‍क में चकरा रही थीं । ऐसी स्रियों को वासना का शिकार बनाकर जिंदा जल दिया गया । बच्चों को संगीनों और त्रिशूलों से छेदकर जल दिया गया ।
‘नहीं’ उसके होठोंं से एक चीख निकल गई ।
‘क़्या हुआ ?’ मुस्‍तफा ने चौंककर पूछा ।
‘कुछ नहीं एक भायानक सपना देख रहा था’ ।
‘जागते हुए’ मुस्‍तफा ने मुस्कराकर पूछा ।
‘जो कुछ हो रहा है वह एक भायानक सपने से भी घिनावना है । ऐसी स्थिती में जागना और सोना सब बराबर है..’ उसने कहा
मुस्‍तफा उसकी बात समझ नहीं सका ।
शामको उसने तय किया वह थोडी दूर तक स्थिती का निरशण करके आएगा । मुस्‍तफा ने उसे ऐसा करने से रोका । वह घर जाने की मुर्खता ना करें।
उसने मुस्‍तफा को विश्वास दिलया वह घर जाने का प्रयत्न नहीं करेगा। थोडी दूर गया तो उसे एक पारिचित मिल गया ।
‘जावेद भाई आप घर जाने का प्रयत्न ना करें.. इसमें बहुत
खतरा है । आपकाघर जिन रास्तों पर है वे खतरों से भारे है । अच्‍छा यही है आप रात में यहां रूक जाए । वैसे स्थिति सामन्य हो गई है। परंतु कब क़्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता...’
‘नहीं मैं घर नहीं जा रहा हूं बस यूंही थोडी दूर तक टहलकर वापस आ जाऊंगा’ उसने उत्तर दिया ।
‘वैसे आप सुरक्षित रास्तों से घर जाना चाहे तो घर जा सकते है । उन रास्तों पर कोई खतरा नहीं है । मैं आपको घर छोड देता हूं ...।’
उसने उसे मेटर साईकल पर बिफ़्या और सुरक्षित रास्तों से होते वे आगे बढे ।
उन रास्तों मेहललों से गुजरते उन्‍हे अनुभव हो रहा था जैसे वहां पर बहुत कुछ हुआ है ।
हर जगह भीड जम हुई थी । राजनेता और वॄद्ध, बुजुर्ग लेग भीड को अपनी अपनी तौर पर समझाने का प्रयत्न कर रहे थे । और भीड को कुछ अनुचित करने से रोक रहे थे ।
क्रोधऔर उत्साह में भारे नवयुवक उनसे तरह तरह के प्रश्न पूछ रहगे थे और अपने पर बार बार होने वाले आन्यायों का हिसाब मंग रहे थे ।
घर के समीप पहुंचा तो पीछे वाली गली में हजारों लेगों की भीड जम हुई थी ।
जिन्ड़े दो लीडर समझाकर स्वयं पर नियंत्रण रखने और धैर्य से काम लेने के लिए कह रहे थे ।
घर आया तो उस पर पत्‍नी भाडक उठी
‘इतना समझाने पर भी आप नहीं मने । आपको समझायाथा ना आप घर ना आएं? अपनी जान खतरे में डालकर चले आए । यदि कुछ अनुचित हो जाता तो ..?’
‘नहीं ऐसी बात नहीं है मैं स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित अनुभव करने के बाद ही यहां आया हूं एक पारिचित मिल गया था उसने मेटर साइकिल पर यहां तक लकर छोडा...’
रात तक स्थिती सामन्य हो गई थी । यह तय था रात आतंक और तनाव में गुजरेगी ।
परंतु आतंक का एक दिन तो बीत गया था । द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918
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Saturday, September 10, 2011

Urdu Short Story Sherni By M.Mubin

افسانہ
شیرنی


از:۔ ایم مبین




جب وہ گھر سےنکلی تو نو بج رہےتھے۔ تیز لوکل تو ملنےسےرہی دھیمی لوکل سےہی جانا پڑےگا ۔ وہ بھی وقت پر مل گئی تو ٹھیک ۔ ورنہ یہ تو طےہےکہ آج پھر تاخیر سےآفس پہنچےگی ۔ اور لیٹ آفس آنےکا مطلب ؟ اس خیال کےساتھ ہی اس کی پیشانی پر بل پڑ گئےاور بھویں تن گئیں ۔ آنکھوں کےسامنےباس کا چہرہ گھوم گیا ۔ اور کانوں میں اس کی گرجدار آواز سنائی دی ۔
” مسز مہاترے! آپ آج پھر لیٹ آئیں ہیں ۔ میرےباربار تاکید کرنےپربھی آپ روز لیٹ آتی ہیں ۔ آپ کی اس ڈھٹائی پر مجھےغصہ آتا ہے۔ آپ کو شرم آنی چاہیئے۔ بار بار تاکید کرنےپر بھی آپ وہی حرکت کرتی ہیں ۔ آج کےبعد میں آپ سےکوئی رعایت نہیں کروں گا ۔
کوئی اس سےبڑی تیزی سےٹکرایا تھا اور اس کےخیالوں کا تسلسل ٹوٹ گیا تھا ۔ وہ سڑک پر تھی ۔ بھیڑ اور ٹریفک سےبھری سڑک اسےپار کرنی تھی ۔ اس لئےاپنےہوش و حواس میں رہنا بہت ضروری تھا ۔ غائب دماغ رہتےہوئےسڑک پار کرنےکی کوشش میں کوئی بھی حادثہ ہوسکتا تھا ۔ جو اس سےٹکرایا تھا وہ تو کہیں دور چلا گیا تھا لیکن اس کےٹکرانےسےاس پر غصہ نہیں آیا تھا ۔
اچھا ہوا وہ اس سےٹکرا گئی ۔ اس کےخیالوں کا سلسلہ تو ٹوٹ گیا اور وہ ہوش کی دنیا میں واپس آگئی ۔ ورنہ تناو
¿ کرنےکی کوشش میں کسی حادثہ کا شکار ہوجاتی ۔ اس نےچاروں طرف چوکنا ہوکر دیکھا ۔ سڑک کےدونوں طرف کی گاڑیاں اتنی دور تھیں کہ وہ آسانی سےدوڑ کر سڑک پار کرسکتی تھی ۔
سگنل تک رکنےکا مطلب تھا خود کو اور دوچار منٹ لیٹ کرنا ۔ اس خیال کےآتےہی اس نےسڑک پار کرنےکا فیصلہ کرلیا اور دوڑتی ہوئی سڑک کی دوسری طرف پہنچ گئی ۔ دونوں طرف سےآنےوالی گاڑیاں اس کےکافی قریب ہوگئی تھیں ۔ ذرا سی تاخیر یا سستی کسی حادثہ کا باعث بن سکتی تھی ۔ لیکن اس نےاپنےآپ کو پوری طرح اس کےلئےتیار کرلیا تھا ۔ کوئی حادثہ نہ ہو اس بات کا پورا خیال رکھا تھا ۔ سڑک پار کرکےوہ اس تنگ سی گلی میں داخل ہوئی ۔ جس کو پار کرنےکےبعد ریلوےاسٹیشن کی حد شروع ہوتی تھی ۔ گلی میں قدم رکھتےہی اس کےدل کی دھڑکنیں تیز ہوگئیں ۔ سانس پھولنےلگی اور ماتھےپہ پسینےکی بوندیں ابھر آئیں اس نےہاتھ میں پکڑےرومال سےپیشانی پر آئی پسینےکی بوندیں صاف کیں اور پھولی ہوئی سانسوں پر قابو پانےکی کوشش کرنےلگی۔ لیکن اسےعلم تھا نہ پھولی ہوئی سانسوں پر وہ قابو پاسکےگی اور نہ ہی دل کےدھڑکنےکی رفتار معمول پر آئےگی ۔
ذہن میں کھوٹا کا خیال جو آگیا تھا ۔ اسےپورا یقین تھا ۔ گلی کےدرمیان میں اس پان کی دکان کےپاس کھوٹا کرسی لگا کر بیٹھا ہوگا ۔ اسےآتا دیکھ کر بھدےانداز میں مسکرائےگا اور اس پر کوئی گندہ فقرہ کسےگا ۔ کھوٹا کا یہ روز کا معمول تھا ۔ صبح شام اس جگہ وہ اس کا انتظار کرتا تھا ۔ اسےپتہ تھا سویرےوہ کب آفس جاتی ہےاور شام کو اب واپس آفس سےگھر جاتی ہے۔ اس کےآنےجانےکا راستہ وہی ہے۔ ریلوےاسٹیشن جانےکا اور ریلوےاسٹیشن سےگھر جانےکا کوئی دوسرا راستہ نہیں ہے۔ ایک ہےبھی تو وہ اتنی دور کا راستہ ہےکہ اس راستےسےجانےکا کوئی تصور بھی نہیں کرسکتا ہے۔ اس لئےکھوٹا اسی راستےپر بیٹھا اس کا انتظار کرتا رہتا تھا اور اسےدیکھتےہی کوئی بھدا سا فقرہ ہوا میں اچھالتا تھا ۔
” ہائےڈارلنگ ! بہت اچھی لگ رہی ہو ۔ یہ آفس ‘ نوکری وکری چھوڑو ۔ مجھےخوش کردیا کرو ۔ ہر مہینہ اتنےپیسےدےدیا کروں گا جو نوکری سےتین چار مہینےمیں بھی نہیں ملتےہوں گے۔ آو
¿ سےاپنا کمرہ بک ہے۔ نوکری کرتےہوئےزندگی بھر شیریٹن ہوٹل کا دروازہ بھی نہیں دیکھ سکوگی ۔ آج ہماری بدولت اس میں دن گزار کر دیکھو ۔ “
کھوٹا کےہر فقرےکےساتھ اسےایسا محسوس ہوتا تھا کہ ایک نیزہ آکر اس کےدل میں چبھ گیا ہے۔ دل کی دھڑکنیں تیز ہوجاتیں تھیں اور آنکھوں کےسامنےاندھیرا چھانےلگتا تھا ۔ تیز چلنےکی کوشش میں قدم لڑکھڑانےلگتےتھے۔ لیکن وہ جان توڑ کوشش کرکےتیز قدموں سےکھوٹا کی نظروں سےدور ہوجانےکی کوشش کرتی تھی ۔
کھوٹا اس علاقےکا مانا ہوا غنڈہ تھا ۔ اس علاقےکا بچہ بچہ اس سےواقف تھا ۔ شراب ‘ جوئے‘ عصمت فروشی کےاڈےچلانا ‘ ہفتہ وصولی ‘ سپاری وصولی ‘ اغوا ‘ قتل اور مار پیٹ وغیرہ ۔ غرض کہ ایسا کوئی کام نہیں تھا جو وہ نہیں کرتا تھا یا اس طرح کےمعاملوں میں ملوث نہیں تھا ۔ وہ جو چاہتا کر گزرتا تھا کبھی پولس کی گرفت میں نہیں آتا تھا ۔ اگر کسی معاملےمیں پھنس بھی گیا تو اس کےاثر و رسوخ کی وجہ سےپولس کو اسےدو دنوں میں چھوڑنا پڑتا تھا ۔
اس کھوٹا کا دل اس پر آگیا تھا ۔ اس پر اس مایا مہاترےپر ایک معمولی ایک چھوٹی سی پرائیویٹ آفس میں کام کرنےوالی ایک بچےکی ماں پر پہلےتو کھوٹا اسےصرف گھورا کرتا تھا ۔ پھر جب اسےاس کےآنےجانےکا وقت اور راستہ معلوم ہوگیا تو وہ روزانہ اس راستےپر اس سےملنےلگا ۔
روزانہ اسےدیکھ کر مسکراتا اور اس پرگندےگندےفقروںکی بارش کرنےلگتا ۔ کھوٹا کی ان حرکتوں سےوہ دہشت زدہ سی ہوگئی تھی ۔ اسےیہ اندازہ تو ہوگیا تھا کہ کھوٹا کےدل میں کیا ہے۔ اور اسےیہ پورا یقین تھا کہ جو اس کےدل میں ہےکھوٹا ایک دن اسےپورا کرکےہی رہےگا ۔ اس تصور سےہی وہ کانپ اٹھتی تھی ۔ اگر کھوٹا نےاپنےدل کی مراد پوری کرڈالی یا پوری کرنےکی کوشش کی تو ؟ اس تصور سےہی اس کی جان نکل جاتی تھی ۔
” نہیں ! نہیں ! ایسا نہیں ہوسکتا ۔ اگر کھوٹا نےمیرےساتھ ایسا کچھ کردیا تو میں کسی کو منہ دکھانےکےقابل نہیں رہوں گی ۔ میں زندہ نہیں رہ پاو
¿بہک سکتےہیں ۔ دوسرےہزاروں لوگ اسےدیکھ کر ایسا کوئی خیال دل میں لاتےبھی تو اسےکوئی پرواہ نہیں تھی کیونکہ اسےپورا یقین تھا کہ وہ کبھی اس خیال کو پورا کرنےکی جرا
¿
لیکن کھوٹا ؟ ہےبھگوان ! وہ جو سوچ لےدنیا کی کوئی بھی طاقت اسےاس کےسوچےکام کو روکنےکی کوشش نہیں کرسکتی تھی ۔ اور وہ آتےجاتےکھوٹا کی دہشت کا شکار ہوتی تھی ۔ اور اس دن تو کھوٹا نےحد کردی ۔ نا صرف راستہ روک کر کھڑا ہوگیا بلکہ اس کی کلائی بھی پکڑ لی ۔
” بہت زیادہ اکڑتی ہو ۔ اپنےآپ کو کیا سمجھتی ہو ۔ تمہیں معلوم نہیں کھوٹا سےتمہارا پالا پڑا ہے۔ ایسی اکڑ نکالوں گا کہ زندگی بھر یاد رکھوگی ۔ ساری اکڑ نکل جائےگی ۔ “
” چھوڑ دو مجھے۔ “ اس کی آنکھوں میں خوف سےآنسو آگئے۔ اور وہ کھوٹا کےہاتھوں سےاپنی کلائی چھڑانےکی کوشش کرنےلگی ۔ لیکن وہ کسی شیر کےچنگل میں پھنسی ہرنی سی اپنےآپ کو محسوس کررہی تھی ۔ کھوٹا بھیانک انداز میں ہنس رہا تھا اور وہ اس کےہاتھوں سےاپنی کلائی چھڑانےکی کوشش کرتی رہی ۔ اس منظر کو دیکھ کر ایک دو راستہ چلنےوالےرک بھی گئے۔ لیکن کھوٹا پر نظر پڑتےہی وہ تیزی سےآگےبڑھ گئے۔ شیطانی ہنسی ہنستا ہوا کھوٹا اس کی بےچینی سےمحظوظ ہورہا تھا ۔ پھر ہنستےہوئےاس نےدھیرےسےاس کا ہاتھ چھوڑ دیا ۔ وہ روتی ہوئی آگےبڑھ گئی ۔ کھوٹاکا شیطانی قہقہہ اس کا تعاقب کرتا رہا ۔ وہ روتی ہوئی اسٹیشن آئی اور لوکل میں بیٹھ کر سسکتی رہی ۔ اسےروتا دیکھ کر آس پاس کےمسافر اسےحیرت سےدیکھ رہےتھے۔
آفس پہونچنےتک رو رو کر اس کی آنکھیں سوج گئی تھیں ۔ اس میں آئی تبدیلی آفس والوں سےچھپی نہ رہ سکی ۔ اسےآفس کی سہیلیوں نےگھیر لیا ۔
” کیا بات ہےمایا ‘ یہ تمہارا چہرہ کیوں سوجا ہوا ہےاور آنکھیں کیوں لال ہیں ؟ “ اس نےکوئی جواب نہیں دیا اور ان سےلپٹ کر دھاڑیں مار مار کر رونےلگی ۔ وہ سب بھی گھبرا گئیں اور اسےتسلی دیتےہوئےچپ کرانےکی کوشش کرنےلگیں ۔ بڑی مشکل سےاس کےآنسو رکےاور اس نےپوری کہانی انہیں سنا دی ۔ اس سےقبل بھی وہ کئی بار کھوٹا کی ان حرکتوں کی بارےمیں انہیں بتا چکی تھی لیکن انہوں نےکوئی دھیان نہیں دیا تھا ۔
” نوکری پیشہ عورتوں کےساتھ تو یہ سب ہوتا ہی رہتا ہے۔ میرا خود ایک عاشق ہےجو اندھیری سےچرنی روڈ تک میرا پیچھا کرتا ہے۔ “
” میرےبھی ایک عاشق صاحب ہیں ۔ سویرےشام میرےمحلےکےنکڑ پر میرا انتظار کرتےرہتےہیں ۔ “
” اور میرےعاشق صاحب تو آفس کےگرد منڈلاتےرہتےہیں ۔ آو
¿
” اگر کھوٹا تم پر عاشق ہوگیا ہےتو یہ کوئی تشویش کی بات نہیں ہے۔ تم چیزہی ایسی ہو کہ تمہارےتو سو دو سو عاشق ہوسکتےہیں ۔ “ ان کی باتیں سن کر وہ جھنجھلا جاتی ۔
” تم لوگوں کو مذاق سوجھا ہےاور میری جان پر بنی ہے۔ کھوٹا ایک غنڈہ ہے‘ بدمعاش ہے۔ وہ ایسا سب کچھ کرسکتا ہےجس کا تصور بھی تمہارےعاشق نہیں کرسکتے۔ لیکن اس دن کی کھوٹا کی یہ حرکت سن کر سب سناٹےمیں آگئیں تھیں ۔
” کیا تم نےاس بارےمیں اپنےشوہر کو بتایا ؟ “
” نہیں ! آج تک کچھ نہیں بتایا ۔ سوچتی تھی کوئی ہنگامہ نہ کھڑا ہوجائے۔ “
” تو اب پہلی فرصت میں اسےسب کچھ بتا دو ۔ “
اس شام وہ معمول کےراستےسےنہیں لمبےراستےسےگھر گئی ۔ اور ونود کو سب کچھ بتادیا کہ کھوٹا اتنےدنوں سےاس کےساتھ کیا کررہا تھا اور آج اس نےکیا حرکت کی ۔ اس کی باتیں سن کر ونود کا چہرہ تن گیا ۔
” ٹھیک ہے! فی الحال تو تم ایک دو دن آفس جانا ہی نہیں ۔ اس کےبعد سوچیں گےکہ کیا کرنا ہے۔ اس کےبعد وہ تین دن آفس نہیں گئی ۔ ایک دن وہ بالکنی میں کھڑی تھی ۔ اچانک اس کی نیچےنظر گئی اور اس کا دل دھک سےرہ گیا ۔ کھوٹا نیچےکھڑا اس کی بالکنی کو گھور رہا تھا ۔ اس سےنظر ملتےہی وہ شیطانی انداز میں مسکرانےلگا ۔ وہ تیزی سےاندر آگئی ۔
رات ونود گھر آیا تو اس نےآج کا واقعہ بتایا ۔ اس واقعہ کو سن کر اس نےاپنےہونٹ بھینچ لئے۔ دوسرےدن آفس جانا بہت ضروری تھا ۔ اتنےدنوں تک وہ اطلاع دئےبنا آفس سےغائب نہیں رہ سکتی تھی ۔
” آج میں تم کو اسٹیشن تک چھوڑنےآو
¿چھوڑنےآیا ۔ جب وہ گلی سےگذرےتو پان اسٹال کےپاس کھوٹا موجود تھا ۔
” کیوں جانِ من ! آج باڈی گارڈ ساتھ لائی ہو ۔ تمہیں اچھی طرح معلوم ہےکہ اس طرح کےسو باڈی گارڈ میرا کچھ نہیں بگاڑ سکتے۔ “ پیچھےسےآواز آئی تو اس آواز کو سن کر جوش میں ونود مڑا لیکن اس نےاسےتھام لیا ۔
” نہیں ونود ! یہ غنڈوں سےالجھنےکا وقت نہیں ہے۔ “ اور وہ اسےتقریباً کھینچتی ہوئی اسٹیشن کی طرف بڑھ گئی ۔ اس شام واپسی کےلئےاس نےلمبا راستہ اپنایا ۔ لیکن اس کالونی کےگیٹ کےپاس پہونچتےہی اس کا دل دھک
سےرہ گیا ۔
کھوٹا گیٹ پر اس کا منتظر تھا ۔
” مجھےاندازہ تھا کہ تم واپس اس راستےسےنہیں آو
¿مجھ سےفرار حاصل کرسکو ۔ “ یہ کہتےہوئےوہ اسےسلام کرتا ہوا آگےبڑھ گیا ۔ رات ونود کو اس نےساری کہانی سنائی تو ونود بولا ۔ ” کل اگر کھوٹا نےتمہیں چھیڑا تو ہم اس کےخلاف پولس میں شکایت کریں گے۔ “
دوسرےدن ونود اسےچھوڑنےکےلئےآیا تو کھوٹا سےپھر آمنا سامنا ہوگیا ۔ کھوٹا کی گندی باتیں ونود برداشت نہ کرسکا اور اس سےالجھ گیا ۔ ونود نےایک مکہ کھوٹا کو مارا ۔ جواب میں کھوٹا نےونود کےمنہ پر ایسا وار کیا کہ اس کےمنہ سےخون بہنےلگا ۔
” بابو ! کھوٹا سےاچھےاچھےتیس مار خاں نہیں جیت سکےتو تمہاری بساط ہی کیا ہی؟ “زخمی ونود نےآفس جانےکےبجائےپولس اسٹیشن جاکر کھوٹا کےخلاف شکایت کرنا ضروری سمجھا ۔ تھانہ انچارج نےساری باتیں سن کر کہا ۔ ” ٹھیک ہےہم آپ کی شکایت لکھ لیتےہیں ۔ لیکن ہم کھوٹا کےخلاف نہ تو کوئی سخت کاروائی کرپائیں گےنہ کوئی مضبوط کیس بنا پائیں گے۔ کیونکہ کچھ گھنٹوں میں کھوٹا چھوٹ جائےگا اور ممکن ہےچھوٹنےکےبعد کھوٹا تم سےاس بات کا انتقام بھی لے۔ ویسےآپ ڈریئےنہیں ہم کھوٹا کو اس کی سزا ضرور دیں گے۔ “
پولس اسٹیشن سےبھی انہیں مایوسی ہی ملی ۔ اس دن دونوں آفس نہیں گئے۔ تناو
¿ نےپولس اسٹیشن فون لگا کر اپنی شکایت پر کی جانےوالی کاروائی کےبارےمیں پوچھا ۔
” مسٹر ونود ! “ تھانہ انچارج نےکہا ۔ آپ کی شکایت پر ہم نےکھوٹا کو پولس اسٹیشن بلا کر تاکید کی ہے۔ اگر اس نےدوبارہ آپ کی بیوی کو چھیڑا یا آپ سےالجھنےکی کوشش کی تو اسےاندر ڈال دیں گے۔ دوسرےدن دونوں ساتھ آفس کےلئےروانہ ہوئے۔ متعین جگہ پر پھر کھوٹا سےسامنا ہوگیا ۔
” واہ بابو واہ ! تیری تو بہت پہونچ ہے۔ کھوٹا سےبھی زیادہ ؟ تیری ایک شکایت پر پولس نےکھوٹا کو بلا کر تاکید کی اور تاکید ہی کی ہےناں ؟ اب کی بار کھوٹا ایسا کچھ کرےگا کہ پولس کو تمہاری شکایت پر کھوٹا کےخلاف کاروائی کرنی ہی پڑےگی ۔ “
” کھوٹا ! ہم شریف لوگ ہیں ہماری عزت ہمیں اپنی جان سےبھی زیادہ پیاری ہےاور اس عزت کی حفاظت کےلئےہم اپنی جان بھی دےسکتےہیں اور کسی کی جان لےبھی سکتےہیں ۔ اس لئےبہتری اسی میں ہےکہ ہم شریف لوگوں کو پریشان مت کرو ۔ تمہارےلئےاور بھی ہزاروں عورتیں دنیا میں ہیں ۔ تم قیمت ادا کرکےمن چاہی عورت کو حاصل کرسکتےہو ۔ پھر کیوں میری بیوی کےپیچھےپڑےہو ؟ “
” مشکل یہی ہےبابو ! کھوٹا کا دل جس پر آیا ہےوہ اسےپیسوں کےبل پر نہیں مل سکتی ۔ اس کی طاقت کےبل پر ہی مل سکتی ہے۔ “
” کمینے! میری بیوی کی طرف آنکھ بھی اٹھائی تو میں تیری جان لےلوں گا ۔ “ یہ کہتےہوئےونود کھوٹا پر ٹوٹ پڑا اور بےتحاشہ اس پر گھونسےبرسانےلگا ۔ ہکا بکا کھوٹا ونود کےوار سےخود کو بچانےکی کوشش کرنےلگا ۔ اچانک راستہ چلتےکچھ راہ گیروں نےونود کو پکڑ لیا ‘ کچھ نےکھوٹا کو ۔ اور وہ کسی طرح ونود کو آفس جانےکےبجائےگھر لےجانےمیں کامیاب ہوگئی ۔ کھوٹا سےونود کےٹکراو
¿ ضرور لےگا ۔ اور کس طرح لےگا اس تصور سےہی وہ کانپ جاتی تھی ۔ وہ ونود کو بہلاتی رہی ۔
” کھوٹا کو تم نےایسا سبق سکھایا ہےکہ آج کےبعد نہ وہ تم سےالجھےگا نہ میری طرف آنکھ اٹھانےکی جرا
¿دےرہی تھی لیکن اندر ہی اندر کانپ رہی تھی کہ کھوٹا ضرور اس بات کا بدلہ لےگا ۔ اگر اس نےونود کو کچھ کیا تو ؟
نہیں ! نہیں ! ونود کو کچھ نہیں ہونا چاہئیےونود میری زندگی ہے۔ اگر اس کےجسم پر ایک خراش بھی آئی تو میں زندہ نہیں رہوں گی ۔ اسےایسا محسوس ہورہا تھا اس کی وجہ سےیہ جنگ چھیڑی ہے۔ اس جنگ کا خاتمہ دونوں فریقوں کی تباہی ہے۔ اس کےعلاوہ کچھ اور نکل بھی نہیں سکتا ۔ بہتری اسی میں ہےکہ دونوں فریقوں کےدرمیان صلح کرادی جائے۔ تاکہ جنگ کی نوبت ہی نہ آئے۔ لیکن یہ صلح کس طرح ممکن تھی ؟ کھوٹا انتقام کی آگ میں جھلس رہا ہوگا اور جب تک انتقام کی یہ آگ نہیں بجھےگی اسےچین نہیں آئےگا ۔ اسےکھوٹا ایک اژدھا محسوس ہورہا تھا ۔ جو اس کےسامنےکھڑا اسےنگلنےکےلئےاپنی زبان بار بار باہر نکالتا اور پھنکاررہا تھا ۔ اس اژدھےسےاسےاپنی حفاظت کرنی تھی ۔ دوسرےدن وہ آفس جانےلگی تو پان اسٹال پر کھوٹا کا سامنا ہوگیا ۔ وہ قہر آلود نظروں سےاسےگھور رہا تھا ۔ اس نےمسکرا کر اسےدیکھا اور آگےبڑھ گئی ۔ اسےمسکراتا دیکھ کھوٹا حیرت سےاسےآنکھیں پھاڑ پھاڑ کر دیکھتا رہ گیا ۔
ایک دن پھر وہ آفس جانےلگی تومسکراتا ہوا کھوٹا اس کا راستہ روک کر کھڑا ہوگیا ۔ اس کی آنکھوں میں ایک چمک تھی ۔
” میرا راستہ چھوڑ دو ۔ “ وہ قہر آلود نظروں سےاسےگھورتی ہوئیغصہ سے بولی ۔
” جانم اب تو ہمارےتمہارےراستےایک ہی ہیں ۔ “ کہتےہوئےکھوٹا نےاس کا ہاتھ پکڑ لیا۔ اس نےایک جھٹکےسےاپنا ہاتھ چھڑالیا اور قریب کھڑےناریل پانی فروخت کرنےوالےکی گاڑی سےناریل چھیلنےکی درانتی اٹھاکر کھوٹا کی طرف شیرنی کی طرح لپکی ۔ کھوٹا کےچہرےپر ہوائیاں اڑنےلگیں ۔ اچانک وہ سر پر پیر رکھ کر بھاگا ۔ وہ اس کےپیچھےدرانتی لئےدوڑ رہی تھی ۔
پھولتی ہوئی سانسوں کےساتھ کھوٹا اپنی رفتار بڑھاتا جارہا تھا ۔ جب کھوٹا اس کی پہونچ سےکافی دور نکل گیا تو وہ کھڑی ہوکر اپنی پھولی ہوئی سانسوں پر قابو پانےکی کوشش کرنےلگی ۔ اور پھر درانتی کو ایک طرف پھینک کر آفس چل دی ۔


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Monday, April 18, 2011

Naya Sahitya Point




 کالی رات کا تخلیقی نوحہ

حقّانی القاسمی


ہمارے عہد کی رات میرؔ کے عہد کی رات سے زیادہ بھیانک اور دہشت ناک ہے۔ ہمارے عہد کا تخلیق کار جس بھیانک کالی رات میں قید ہے ، اس کالی رات کو وہ اِظہارات کے مختلف پیرائے میں پیش کررہا ہے ۔
آج کے عہد کی رات نے تخلیقی ذہنوں میں جس عدم تحفظ ، خوف اور دہشت کو جنم دیا ہے ، وہ خوف ہی ان کی تخلیق کا بُنیادی محور بن گیا ہے ۔ ہمارے عہد کے ہر حساس تخلیق کار کی فکری مطاف ، خوف ، دہشت اور جبریت ہے ۔ وہ جو انتظار حُسین نے کہا ہے وہ آج کی صورت ِحال پر مکمل طور پر صادِق آتا ہے ۔ آج کا تخلیق کار اِس جنجال اور دُبدا میں ہے جیسی دُبدا انتظار حُسین نے محسوس کی ہے ۔
شاعری تو ایسی بھی ہوتی ہے ، جو نعرے ہی کے زور پر چمکتی ، گرجتی ہے ۔ مگر کہانی ایسی چھوئی موئی ہے کہ نعرے کا پرچھاواں بھی پڑجائے تو مرجھا جاتی ہے ۔ پھر کہانی کیا کرے ؟ ایک طرف جنگ ہے ، دہشت گردی ہے ، بُنیاد پرستی ہے ، کلاشنکوف ہے ، ایٹمی دھماکے ہیں ، نظریات ہیں ، جن کی چھتری میں یہ سرگرمیاں اخلاقی جواز حاصل کرتی ہیں ۔ دُوسری طرف اس کے خلاف نعرے ہیں ، خطبے ہیں ، تقریریں ہیں ۔ چکی کا ایک پاٹ وہ ، دُوسرا پاٹ یہ ..... جمیعتِ خاطر کوئی صورت ہو ، کہاں ہے ؟ کہیں نہیں ۔ صحیح کہا کہ آسُودگی کا تو بس نام ہی رہ گیا ہے ۔ آسُودگی عرضیت نہ یاں ہے نہ وہاں ہے ۔ یہ تو وہی سودا ؔوالا زمانہ واپس آگیا ۔ اُس سے بھی بُرا ، نئے بٹ مار ، نئے قزّاق ، لُوٹیں ہیں دِن رات بجا کرنقّارہ نفرت کا بول بالا ، حرفِ محبت عنقا ، کلامِ نامک بے اثر ، کیسی شاعری کہاں کی کہانی ، دِل میں خس کی برابر جگہ نہ پائے ۔ کبیرؔ رویا ، سودا ؔنے زہر خند کیا ، ادھر قلم رُک گیا ۔ اب میں دُبدا میں ہُوں ۔ اِسی قسم کی دُبدا جو داستانوں ، کہانیوں میں وقتاً فوقتاً مہم جُو شہزادے کو آلیتی ہے ۔ کہ پیچھے کھائی ، آگے سمندر ، نہ پائے رفتن نہ جائے ماندن ، پھر کیا کیا جائے ۔ بس اچانک خواجہ خضر ؔنمودار ہوتے ہیں کہ میری اُنگلی پکڑ اور چل یا کوئی غیبی آواز آتی ہے کہ لوح کو پڑھ او راِس میں جو کچھ لکھا ہے ، اس پر عمل کر ۔ میرے پاس کون سی لوح ہے ۔ ہاں ، ہاں ہے ۔ الف لیلہ ! میرے پاس یہی لوح ہے ۔ لوح کہو ، فکشن کا اِسم اعظم کہو اور یہ اب کون سی آواز آئی جیسے سُنی ہُوئی ہو ۔ ارے ، یہ تو الف لیلہ کے وَرقوں کے بیچ سے ........ شہر زاد آواز ہے ۔ کیا کہتی ہے ، کچھ بھی نہیں کہتی ؟ نہ کوئی ہدایت ، نہ کوئی پیغام ، نہ کوئی فلسفہ ، نہ کوئی نظریہ ۔ بس کہانیاں سُنائے چلی جارہی ہے ۔ ایک کہانی ، دُوسری ، تیسری کہانی ، سلسلہ ٹوٹنے ہی میں نہیں آرہا ۔ اے وزیر زادی ! اے کہانیوں کی ملکہ ! ایسے وقت میں تمھیں کہانیوں کی سُوجھی ہے ۔ جان کی خیر مانگو ، یہ سب رات رات کا کھیل ہے ۔ صبح ہونے پر تمہاری گردن ہوگی اور جلاد کی تلوار ۔ کہانی رات کو اِسی لئے سُنائی جاتی ہے کہ وقت کٹے اور رات کٹے ۔ میں بھی ایک لمبی کالی رات کے بیچ سانس لے رہا ہُوں ۔ اِس رات کا دستہ شہر زاد کی راتوں سے ملتا ہے ۔ تو گویا اس رات کا بھی تو توڑ یہی ہے کہ کہانی کہی جائے ۔ جب تک رات چلے ، کہانی چلے ۔
ایم ۔ مبین کی کہانیاں بھی اسی رات کا توڑ ہیں اور اسی رات کی اندوہناکی کو اُنھوں نے اپنی تخلیق کی بُنیاد بنایا ہے ۔ ایم ۔ مبین جیسے تخلیق کار جو کھلی آنکھوں سے سماج اور سیاست کا منظر نامہ دیکھ رہے ہیں ، اُن کا المیہ یہی ہے کہ وہ ان سانحات اور واقعات سے اپنی آنکھیں بند نہیں کرسکتے جو آج کل کے صنعتی شہر ی معاشرے میں رُونما ہورہے ہیں ۔ ایک حساس ذہن وقت کی دستکوں کو اپنے سینے پر محسوس کرتا ہے اور یہی دستکیں اُس کے پورے وجود میں پھیل جاتی ہیں تو وہ بے کلی اور اضطراب سا محسوس کرتا ہے اور یہی اضطراب جب تخلیق میں بدلتا ہے تو یہ اضطرابی لہریں اُن ذہنوں کو بھی اسیر کرلیتی ہیں ، جو اُنھیں محسوسات کی سطح پر دیکھتے تو ہیں، مگر اِظہاری سطح پر اپنے درد کا اِظہار کرنے سے قاصر رہتے ہیں ۔
ایم ۔ مبین کے افسانے آج کے عہد کا آشُوب نامہ ہیں ۔ اُنھوں نے اپنے عہد کے انتشار کو تخلیقی ہنر مندی کے ساتھ اپنے اِظہار کا لمس عطا کیا ہے ۔ اپنے عہد کی معاشرتی ، سیاسی صُورتِ حال اور انسانی ذہن اور احساس کی کیفیات کو بڑی ہی فن کاری کے ساتھ اپنی کہانیوں میں پیش کیا ہے ۔ اور یہاں اِس حقیقت کا اِظہار ضروری ہے کہ جن تخلیق کاروں نے اپنے عہد کے انتشار کو اپنی تخلیق کا محور بنایا ہے ، وہ زمانی و مکانی حدُود سے ماورا ہوگئے ہیں اور ان کی تخلیقات کو مابعد کے زمانوں میں حوالوں کی حیثیت حاصل رہی ہے ۔
ایم ۔ مبین نے بھی اپنی تخلیق میں زیادہ تر اپنے عہد سے ہی سروکار رکھا ہے اور اپنے عہد کی تمام تر تصویروں کو اپنی تخلیق میں قید کرلیا ہے ۔ اُنھوں نے تجریدی طرز ِاِظہار یا علامتی اسلوب سے قاری کے لئے پیچیدگیاں پیدا نہیں کیں بلکہ صاف شفّاف بیانیہ اسلوب میں اپنے عہد کی تفہیم کی کوشش کی ہے اور اس میں قاری کی ذہنی سطحوں کا بھی خیال رکھا ہے ۔ ان کے اسلوب میں جو کھردرا پن ہے ، وہ بھی ماحول کا زائیدہ ہے ۔ ایسے پُر خطر ماحول میں انسان کی سوچ بھی کھردری ہوجاتی ہے اور زندگی کی بے کیفی اسلوب پر حاوی ہوجاتی ہے ۔ اِس کا مطلب یہ نہیں کہ اُن کے لہجے اور اسلوب میں صرف کرختگی ہے ، بلکہ یہ کرختگی افسانے کا تقاضہ ہے اور اِس کی تکمیل کے لئے یہ اسلوب ہی ناگزیر تھا۔
ایم ۔ مبین کی کہانیاں اپنے عہد کی تاریخ بھی ہیں اور اپنے عہد کا اضطراب بھی ۔ ان کے بیشتر افسانوں کا محور مذہبی خطوط پر انسانی ذہنوں کی تقسیم اور اس تقسیم سے پیدا شدہ بھیانک مسائل ہیں ۔ ایم ۔ مبین کے افسانوں میں فسادات ، جبر اور ہولناکی کی جو فضا ہے ، وہ آج کے ماحول کی دین ہے ۔ ان کے زیادہ تر افسانے Systemکے خلاف ہیں ۔ وہ سسٹم جو ساری بُرائیوں اور سارے فساد کی جڑ ہے ۔ دراصل یہی وہ نظام ہے ،جس کی وجہ سے انسان زرد کُتّا بن گیا ہے ۔
ایم ۔ مبین کے افسانوں میں سوالات ہیں ، احتجاج کی آوازیں ہیں اور یہی احتجاج آج کے افسانے کا غالب عنصر ہے ۔ افسانوں سے احتجاج غائب ہوجائے تو افسانے معنویت کھودیتے ہیں ۔ ایم ۔ مبین نے اپنے افسانوں کے ذریعہ اپنے عہد کی بے زبانی کو بھی زبان عطا کرنے کی کوشش کی ہے ۔ دراصل خوف و دہشت میں جکڑی ہُوئی زبانیں جب سکوت اختیار کرلیتی ہیں تو مسائل اور بھی پیچیدہ ہوجاتے ہیں ۔ ایم ۔ مبین نے آج کے انسان کے کرب اور ذہنی کیفیات کے تناظر میں کہانیاں لکھی ہیں اور یہ کہانیاں انسانی رِشتوں اور تعلقات کی کہانیاں ہیں ۔ اِس میں Innerاور Outer lifeکی جھلکیاں ملتی ہیں ۔ ان کہانیوں کے کردار بالکل ویسے ہی حقیقی ہیں ، جیسے " وار اینڈ پیس ، وینٹی فےئر ، مادام بواری Tristam Shandy" کے کردار حقیقی ہیں ۔ ایم ۔ مبین کے افسانوی کرداروں کی آنکھوں سے محبت ، جنگ ، امن ، دہشت ، خوف ، فیملی لائف ، سوشل لائف کے سارے رنگ دیکھ سکتے ہیں ۔ یہ کردار راوی کے ذہن سے نکل کر قاری کے ذہن میں ہلچل اور ہیجان بپا کرتے ہیں ۔
ایم ۔ مبین کی کہانیاں صرف ایک حساس ذہن کے اِضطراب کی آئینہ دار نہیں ہے ، بلکہ ان کہانیوں میں ہمارے عہد کا اِضطراب ہے ، وہ اِضطراب جو تخلیقی ذہنوں میں شعلگی کی کیفیت پیدا کرتا ہے اور پھر یہی شعلگی جب حساس خلّاق ذہن سے عام انسانی ذہن میں منتقل ہوتی ہے تو آگ سی دہکتی ہے اور قاری اپنے وجود کو شعلوں کے حصار میں محسوس کرتا ہے ۔ شہر زاد نے اپنے عہد کے کرب کو کہانی میں پیش کیا تھا ۔ ہمارے آج کا تخلیق کار بھی اپنے عہد کے کرب کو پیش کررہا ہے ۔ ایم ۔ مبین کے افسانوں کا اِمتیاز یہ ہے کہ اُنھوں نے اپنے افسانے میں آج کے عہد کی سوچ ، کرب اور اس کے تمام تر زاویوں کو پیش کیاہے ۔
ایم ۔ مبین کی کہانیاں آج کی سچویشن کی شاعری ہے اور یہ شاعری اپنی تمام تر اِظہاری قوت کے ساتھ ہمارے عہد کے ضمیروں کو جھنجھوڑ رہی ہے ۔ یہ اِسی نوع کی پویٹری ہے جیسی وار اینڈ پیس وِد رِنگ ہائٹس میں اور جین آسٹن ؔکے ہاں ملتی ہے ۔


 
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