Wednesday, October 19, 2011

Hindi Short Story Kitne Nark By M.Mubin


कहानी   कितने नरक  लेखक  एम मुबीन   


सवेरे जब वह घर से निकली थी तो बुशरा  बुखार में तप रही थी.
"अम्‍मी ! मुझे छोड़कर मत जाओ, अम्‍मी  आज स्कूल मत जाओ मुझे बहुत डर लग रहा है."
जब वह जाने की तैयारी कर रही थी तो बुशरा  की आंख भी खुल गई थी और वह उसे आज स्कूल न जाने के लिए जिद कर रही थी.
"नहीं बेटे!" प्यार से उसे समझाने के लिए जब उसने उसके माथे पर हाथ रखा तो कांप उठी. बुशरा  के माथे बुखार से तप रही थी.
"अम्‍मी  से इस तरह की ज़िद नहीं करते." यह कहते हुए उसकी भाषा लड़खड़ा गई थी. "आज अम्‍मी  का स्कूल जाना बेहद जरूरी है. कल चाहे रोक लेना. तुम कहो तो कल हम आठ दिनों के लिए स्कूल नहीं जायेंगे तुम्हारे पास ही रहेंगे. आज हमें जाने दो. "
"अम्‍मी  रुक जाओ नां! मुझे अच्छा नहीं लग रहा है." बुशरा  रोने लगी थी.
"नहीं रोते बेटे!" बुशरा  को रोता देख कर उसकी आंखों में भी आंसू आ गए थे. परंतु बड़ी मुश्किल से उसने अपने आंसुओं को रोका था और भुराई हुई आवाज़ पर काबू पाने की कोशिश की थी. "हम आज जल्दी घर आ जायेंगे फिर तुम्हारे अब्बा तो तुम्हारे पास ही हैं नां बेटा. डरने की कोई बात नहीं है. "
दूसरे कमरे में तारिक़ और ावफ बेखबर सो रहे थे. थोड़ी देर सिसककते रहने के बाद बुशरा  की भी आंख लग गई थी. उसने अपना परस कंधे पर लटका और जाकर धीरे से तारिक़ को हिलाने लगी.
"आं! क्या बात है?" तारिक़ ने आंख खोल दी.
"मैं जा रही हूँ." वह बोली. "बुशरा  को सख्त बुखार है उसे डॉक्टर के पास ले जाना. नौकरानी से कह देना कि उसका अच्छी तरह ध्यान रखे. यदि संभव हो तो आज आप छुट्टी कर लें. वैसे मैं आज जल्दी आने की कोशिश करूंगी परंतु कह नहीं सकती कि यह संभव हो सकेगा भी या नहीं क्योंकि आज इन्‍सपेकशन  है. यदि इन्‍सपेकशन  न होता तो आज जाती ही नहीं. "
"ठीक है." तारिक़ ने उठते हुए जमाही ली. वह जब घर से बाहर आई तो चारों ओर गहरा अंधेरा था. सर्दियों के दिनों में सात भी बज जाते हैं तो अंधेरा ही छाया रहता है दिन नहीं निकलता और उस समय तो केवल साढ़े पांच ही बजे थे. पूरी गली सुनसान थी. रास्ते पर इक्का दुक्का लोग आ जा रहे थे. ऐसे आलम में किसी औरत के घर से निकलने की कल्पना भी नहीं किया जा सकता है. वह प्रतिदिन उसी समय अकेली उस गली से गुज़र कर रिक्शा स्टैंड तक जाती जो लोग सवेरे जल्दी जागने के आदी थे. उन्हें पता था कि वह उस समय घर से स्कूल जाने के लिए निकलती है. ननवा लोग उससे दो बातें कर लिया करते थे.
"बेटी स्कूल जा रही हो."
"हाँ बाबा." वह उत्तर देती.
"भाबी अकेली अँधेरे में प्रतिदिन  इतने सवेरे जाती हो तुम्हें डर नहीं लगता?"
"अब तो आदत हो गई है." वह मुस्कुरा कर कहती.
सभी ननवा और अच्छे नहीं होते. कभी कभी कोई अजनबी और बदमाश भी मिल जाता है. अकेले में उस समय किसी अजनबी औरत को देख कर वह जो कुछ कर सकता है वह करने से नहीं चौकता था. कभी कोई भद्दा सा वाक्यांश मुंह से निकाल देता . कभी कोई नागवार बात कह देता. कोई तो जसारत कर धक्का देकर आगे बढ़ जाता और अपनी किसी मानसिक  इच्छा की संतोष कर लेता. ऐसी स्थिति में इस प्रक्रिया सिवाय ख़ामोशी और कुछ नहीं होता था. न तो वह से उलझ सकती थी न शोर मचा कर अपनी मदद के लिए किसी को बुला सकती थी. उलझी तो नुकसान उसी का होता. अकेली औरत जो ठहरे. किसी को मदद के लिए बुलाती तो संभव नहीं था कि कोई उसकी मदद को आता. इतने सवेरे कोई अपनी लाखों रुपए की मीठी नींद खराब करता है? अगर कोई आए भी तो बदमाश से तो उसे मुक्ति मिल जाती परंतु मदद करने के वाक्यों से शायद जीवन भर मुक्ति  नहीं मिलती.
"इतनी रात गए अकेली घर से निकली हो. शरीफ़ औरतों के क्या यही चाल चलन हैं?"
"यदि इज़्ज़त का उतना ही पास है तो अकेली इतने सवेरे घर से क्यों निकलती है. घर में रहा करो. छोड़ दो यह नौकरी." गरज वह ऐसी बातों से कतरा के लिए अपने साथ हुए जा रहे बे जा व्यवहार को अनदेखा कर आगे बढ़ जाती थी. रिक्शा स्टैंड से एस टी के लिए उसे पाँच मिनट में रिक्शा मिल जाता था. कभी कभी तो उसे रिक्शा तैयार मिल जाता था कभी दो चार मिनट रिक्शा का इंतजार करना पड़ता था. कुछ रिक्शा वालों को पता था वह उस समय वहां से एस. टी स्टैंड जाने के लिए निकलती है तो वह उसके इंतजार में वहाँ पहुँच जाते थे. इसमें भी उन लोगों की नियत के दो पहलू होते थे. कुछ शरीफ लोग अपनी रोज़ी धंधे के लिए की सीट पाने के लिएवहाँ पहुँचते थे. कुछ बदमाश मानसिकता वाले केवल स्वाद के लिए वहाँ पहुँचते थे कि एक अकेली अकेले खूबसूरत जवान लड़की को अकेले रिक्शा में एस. टी स्टैंड तक पहुँचाने का अवसर मिलेगा. उससे कुछ ऐसी भी बातें हो सकती हैं जो उनके लिए मानसिक  स्वाद का कारण हूँ. ऐसी हालत में वह ख़ामोश रहकर यात्रा को प्राथमिकता देती थी.
उनका कोई उत्‍तर  नहीं देती थी या यदि देती भी तो ऐसा उत्‍तर  देती कि उसकी सारी उम्मीदों और इरादों पर पानी फिर जाए. ऐसी स्थिति में जो दुर्घटना संभव था वह एक बार इसके साथ हो चुका था. सन्नाटे और अंधेरे का लाभ उठाकर एक रिक्शा वाले ने उसे गलत रास्ते पर ले जाना चाहा. उसने चीख कर उसे रोका जब उसने नहीं सुना तो चलते रिक्शे से कूद गई. उसे मामूली चोटें आईं परंतु उसकी सौभाग्य था कि सामने पुलिस खड़ी थी और उसे रिक्शा से कूदती देखा तो दौड़कर उसके पास पहुंचे.
"क्या बात है मैडम, क्या आप रिक्शा से गिर गईं?"
"नहीं! वह रिक्शा वाला मुझे अकेली देख कर गलत रास्ते पर ले जा रहा था."
"ऐसी बात है?" यह सुनते ही दो पुलिस वाले गाड़ी लेकर भागे. थोड़ी देर बाद ही वह रिक्शा को मारते हुए उसके पास ले आए उन्होंने शायद उसे बुरी तरह मारा था. उसके माथे से खून बह रहा था .
"बहन जी मुझे क्षमा कर दो! अब जीवन भर ऐसी गलती नहीं करूंगा." वह उसके पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाते लगा तो उसने पुलिस वालों से कहा कि उसके विरूध  कोई कार्रवाई न करे उसे छोड़ दे. इस घटना को तो उसने अपने तक ही सीमित रखा था परंतु रिक्शा वालों में शायद इस घटना का प्रचार हो गई थी क्योंकि उसके बाद उसके साथ ऐसा कोई घटना पेश नहीं आया था.
इस घटना से वह स्‍वंय  बहुत डर गई थी. उसने सोचा था कि वह अपना रूपांतरण दोपहर की नलं में करा ले जाएगा. इसके लिए उसने काफी हाथ पैर भी मारे थे. परंतु बात नहीं बन सकी थी. रूपांतरण करने वाले इतनी कीमत मांग रहे थे जितनी देना उसकी बिसात के बाहर था. वैसे दोपहर की नलं उसके और उसके घर वालों के पक्ष में भी उचित नहीं थी. दोपहर की नलं करने के लिए उसे सवेरे नौ दो बजे घर से निकलना होगा और वापसी शाम सात आठ दस बजे तक संभव ही नहीं हो सकेगी. ऐसी स्थिति में घर, ावफ और बुशरा  का कौन ध्यान रखेगा. तारिक़ ड्यूटी देखेगा या घर और बच्चों को?
इसलिए उसने दूसरी नलं लेने का इरादा बदल दिया था. सवेरे की नलं के लिए उसे साढ़े पांच बजे के समीप  घर से निकलना पड़ता था. इस तरह से वह ठीक वक्त पर स्कूल पहुंच भी जाती थी. स्कूल से दो ढाई बजे के समीप  वापस घर आ जाती थी. तारिक़ दस ग्यारह बजे तक घर में ही रहता था उसके बाद नौकरानी आ जाती उसके आने तक नौकरानी घर और बच्चे संभाली थी. साढ़े पांच बजे घर छोड़ने के लिए उसे चार बजे जागने पड़ता था. जागने के वह अपने और बच्चों के लिए सवेरे का नाश्ता और कभी कभी दोपहर का खाना बनाती थी हाँ! कभी देर हो जाती तो यह जिम्मेदारी नौकरानी पर डालनी पड़ती. सारे काम करके वह ठीक वक्त पर घर से निकल जाती थी. निकलते समय वह हल्का सा नाश्ता कर लेती थी परंतु स्कूल में उसे भूख लग ही जाती थी. अवकाश में उसे हल्का नाश्ता करना ज़रूरी हो जाता था. इसके बाद वह घर आकर ही खाना खाती थी.
बस स्टैंड पहुंचने के बाद उसे पुणे छह बजे बस मिल जाती थी. यह बस भी समझमह थी. कभी बिल्कुल खाली होती थी तो कभी इतनी भीड़ कि पैर रखने के लिए भी मुश्किल से जगह मिलती थी. बस खाली हो या भीड़ उसे उसी से यात्रा करना आवश्यक होता था. अगर वह बस छूट जाए तो निश्चित समय पर स्कूल लगना ना मुमकिन था. क्योंकि 20 किलोमीटर का पल सरा् सा यात्रा उसी बस द्वारा निर्धारित समय में तय करना संभव था. वरना भिवंडी थाना यात्रा? भगवान की शरण. भिवंडी से निकले लोग नासिक पहुँच जाये परंतु थाना जाने के लिए निकले रास्ते में ही फंसे रहे. खराब रास्ता, आवागमन, यात्रियों, बस कंडकटर, चालक के झगड़े. सुबह के समय आवागमन कम होती थी भीड़ कम होने की वजह से कंडकटर का मूड भी अच्छा होता था. इसलिए यह यात्रा निश्चित समय में पूरा हो जाता था. इसके बाद थाने से आधे घंटे का लोकल ट्रेन यात्रा. उसमें बहुत कम परेशानी होती थी. दो चार मिनट में कोई तेज या धीमी लोकल मिल जाती थी. सवेरे का समय होने के कारण लोकल में भीड़ नहीं होती थी. कभी सामान्य डिब्बे में जगह मिल जाती थी तो कभी लीडीज़ डिब्बे में. हाँ! किसी मजबूरी के तहत भीड़ होने की वजह से खड़े होकर यात्रा करना भी भारी नहीं पड़ता था.
लीडीज़ डिब्बे में खड़े होकर यात्रा करने में तो कोई समस्या पेश नहीं आती थी परंतु जनरल डिब्बे में खड़े होकर यात्रा करना औरत के लिए प्रकोप  से कम नहीं है. धक्के शरीर की हड्डी पसलियां एक कर देते हैं. और एक औरत को तो कुछ अधिक ही धक्के लगते हैं और विशेष रूप से नाजुक स्थानों पर. ऐसा लगता है जैसे कई गध अपनी नवकीली चौनचों से उसका मांस नोच रहे हैं. कभी राहत भरा आराम तो कभी प्रकोप  भरा यह सफर तय करने के बाद कुछ क़दमों का पैदल यात्रा और उसके बाद स्कूल. कैसी अजीब बात थी.
तीस चालीस किलोमीटर से आती थी. परंतु कभी कभी वे सबसे पहले स्कूल आने वाली एकमात्र शिक्षक होती थी. या पहले नहीं भी आती थी तो लेट कभी नहीं होती थी. मगर स्थानीय शिक्षक हमेशा देर से आते थे. इसके बाअस्तित्‍व  अगर किसी दिन मजबूरी से एक आध घंटा देर से स्कूल पहुँचती तो लोग नाक भौं चढ़ाने. और देरी से आने के लिए उसे उत्‍तर  देना पड़ता था या उसकी उपस्थिति में लेट मार्क किया जाता था. वह उसके विरोध भी करती तो उसका विरोध बेअसर रहता. क्योंकि स्कूल में कोई लॉबी नहीं था. लॉबी न होने की वजह से उसके विरोध में न तो शक्ति थी और न प्रभाव. जिनकी लॉबी मजबूत थी वह सारे कानून को ताक पर रखकर नौकरी करते थे.
स्कूल से वह साढ़े बारह बजे के समीप  निकलती थी. थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद रेलवे स्टेशन और स्थानीय से थाना. और थाना आने के बाद भिवंडी  तक पीड़ा नअक यात्रा.
जब भी वह थाना भिवंडी  के बीच यात्रा करती थी उसे सरा् मसतकीम की याद आती थी. दिन महशर के बाद बन्दों को जिस बाल से बारीक पुल से यात्रा करना होगा जिसके नीचे नरक की आग महक रही होगी. वह यात्रा कितना यातना नाक होगा इसका तो माना जा सकता था. परंतु इस यात्रा को तय करते हुए जो यातना सहन  करनी पड़ती थी उसकी कोई सीमा नहीं थी.
पहले बस की लाइन में घंटों खड़े रहना धक्के खाना. प्रकार के लोगों की नापाक नजरों का निशाना बनना. फिर दानसतगी या नादानसतगी से लगाए उनके हवस नाक धक्कों को अपने शरीर पर झेलना. बस आई और जगह मिल गई तो गनीमत वरना फिर भीड़ में खड़े खड़े यात्रा. भीड़ में घुटता दम और शरीर का निकलता कचूमर. इस यात्रा में यात्रा करने वाले यात्री भी कितने बे हस होते हैं.
कोई खड़ा है इससे उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता है. उन्हें जगह मिल गई उनके लिए बस यही काफी है. कोई भूल कर भी यह नहीं सोचे कि कोई औरत खड़ी है. उसे बैठने के लिए जगह देनी चाहिए. अगर कोई इतनी फ़्रापदिली करेगा तो फिर उस फ़्रापदिली मूल्य भी प्राप्त करने की कोशिश करेगा. उस फ़्रापदिली की यातना नाक भुगतान करने से बेहतर तो है धक्के सहते हुए शरीर के बीच घट कर खड़े खड़े यात्रा करें. महिला थकी हुई है, गर्भवती या बीमार है कोई इस बारे में नहीं सोचता. उसकी इन स्थितियों पर दया खा कर कोई उसे जगह देने की कोशिश नहीं करता. यदि जगह देता है तो उससे मूल्य प्राप्त करने की नियत है. चाहे वह किसी भी हालत में हो . फिर ऐसी हालत में यह यात्रा और लंबी हो जाता है.
किसी दिन कोई एक्सटेंडिड हो गया जिसकी वजह से यातायात जाम हो गई और फिर सामान्य आने में घंटों लग गए और एक आधे घंटे की यात्रा दो तीन घंटे शामिल हो गया. घटना नहीं भी हुआ तो बेतरतीब से घुसने वाले वाहनों के कारण से यातायात जाम हो गई.
मामूली मामूली बातें कभी बड़ी बड़ी वजह बन कर कई घंटे बरबाद कर देती हैं. जब वह घर पहुँचती है तो भूख चमकी हुई है. सारा शरीर थकान से टूट रहा है आंखों में नींद समाई होती है. उसे कुछ वझाई नहीं देता है वह क्या करे खाना खाये, आराम करे या सोए उसके आते ही बच्चे उसे घेर लेते हैं वह उससे लिपट कर इतनी देर की दूरी के एहसास को कम करना चाहते हैं. और थकान की वजह से बच्चों के शरीर की निकटता भी उसे बिजली का तार महसूस होती है. बड़ी मुश्किल से पलंग पर लेट कर थोड़ी देर सस्ता कर फिर अपने कामों में लग जाती है. यदि नौकरानी ने खाना नहीं बनाया तो उसे खाना बनाना पड़ता है. इस बीच तारिक़ भी आ जाता है और फिर सब मिल कर खाना खाने बैठ जाते हैं. कभी वह जल्दी आ गई तो सब साथ ही खाना खा लेते हैं. कभी देर हो गई तो निर्धारित समय पर तारिक़ और बच्चे खाना खा लेते हैं. उसे अकेले ही खाना पड़ता है. खाना खाने के बाद एक दो घंटे की नींद का सामान्य है. एक दो घंटे सोने के बाद उसकी सारी थकान दूर हो जाती है. और तरोताज़ा होकर घर के कामों में लग जाती है.
घर के छोटे मोटे काम करना, रात का खाना बनाना, शाम बाज़ार जाकर शॉपिंग करना आदि आदि. परंतु जरूरी नहीं कि प्रतिदिन  जीवन का यह सामान्य है. कभी कभी सामान्य में मामूली बदलाव भी बड़ी यातना नाक साबित होती है. आज बुशरा  को सख्त बुखार आ गया. शाम से ही उसे हल्का हल्का बुखार था. आधी रात के बाद बुखार की तीव्रता बढ़ गई और अब वह तप रही है. उसका स्कूल जाना भी ज़रूरी है. इन्‍सपेकशन  जो है. एक महीने अगर वह स्कूल न तो चल सकता है परंतु इन्‍सपेकशन  के दिन न जाए यह कैसे संभव है?
एक मुहावरा है उस दिन तो बिस्तर मरग से उठ कर भी स्कूल आना जरूरी है. वह कई सालों से कोशिश कर रही है कि उसे भिवंडी का कोई टीचर मिल जाए जो उसके साथ मयूचौल ले. और प्रतिदिन  इस पल सरा् यात्रा से मुक्ति  मिल जाए. चाहे उसमें उसे वेतन में नुकसान सहना पड़े. परंतु आज तक यह संभव नहीं हो सका है. उस तरह कई शिक्षक मुंबई पढ़ाने जाते हैं. और मुंबई से शिक्षक पढ़ाने के लिए भिवंडी  आते हैं.
सब समस्याओं एक हैं. परंतु कोई भी उसे ऐसा हम विचार नहीं मिलता जो यातना से दोनों को उद्धार. घर बाल बच्चे पति भिवंडी  हैं नौकरी के लिए मुंबई जाना पड़ता है. जब तक विवाह  नहीं हुई थी कोई समस्या नहीं था यहयात्रा किसी तकलीफ का कारण नहीं था. हर दिन एक नया अनुभव और एक नया ाीडोनचर होता था. विवाह  के बाद भी कोई समस्या नहीं पैदा हुआ. केवल जल्दी घर पहुँच कर पति को देखने की इच्छा मन में ाँगड़ाईाँ लेती रहती थी. परंतु के बाद बच्चे आ गए और समस्याओं बढ़ते गए.
घर में कोई नहीं था जिनके भरोसे बच्चों को छोड़ कर संतुष्ट हो कर ड्यूटी पर जा सके. सब कुछ नौकरों के सहारे और उनके भरोसे करना पड़ता था पता नहीं नौकर बच्चों का अच्छी तरह ध्यान रखते भी होंगे या नहीं. बस यही प्रशन   हर क्षण मन को कचौकता रहता था. कई बार तो मन में आया नौकरी छोड़ दे. मियाँ बीवी में सलाह भी हुआ परंतु यह तय भावनात्मक फैसला साबित हुआ. जब सामने सच्चाई की प्रवेश दीवारें आईं तो यह फैसला उससे टकरा कर पाश पाश हो गया . अभी अभी नया घर लिया था.
तारिक़ की आधी से अधिक वेतन फ्लैट के लिए ऋण के सप्ताह भुगतान में खर्च हो जाती थी. अल्प आय के सहारे भिवंडी  जैसे महँगे शहर में जिंदा रहना भी हर चीज़ के लिए तरस तरस कर दिन मरना था. इसलिए नौकरी भी आवश्यक थी. और नौकरी के लिए प्रतिदिन  यातना यात्रा भी जरूरी था. बच्चे बुखार में तप रहे थे परंतु फिर भी स्कूल जाना जरूरी. घर पहुंचने की जल्दी परंतु ऐसे हालात पैदा हो गए कि सामान्य से दो चार घंटे लेट लगना पड़े.
प्रतिदिन  समय पर स्कूल जाना हो जाता था. एकाध बार बस या ट्रेन देर से चलने के कारण स्कूल पहुंचने में देरी हो गई और उसी दिन किसी अधिकारी ने स्कूल का दौरा किया. और हाथ में देरी से स्कूल आने का मीमो आ गया. रक्षा में बैठी तो कोई बुशरा  की बीमारी के साथ इन्‍सपेकशन  होने की वजह से जल्दी या समय पर स्कूल पहुंचने का विचार था. समय पर बस भी मिल गई और बैठने के लिए जगह. परंतु रास्ते में बस ड्राइवर एक ट्रक वाले से उलझ गया . उनके झगड़े में पंद्रह मिनट देर हो गई. थाने स्टेशन पर आई तो तेज लोकल निकल चुकी थी. धीमी ट्रेन दस मिनट देर से आई. स्कूल पहुंची तो पूरे आधे घंटे देरी हो गई थी.
शिक्षा अधिकारी आ चुका था और इन्‍सपेकशन  शुरू हो चुका था. "श्रीमती मोमिन! आपको शर्म आनी चाहिए. आप आधा घंटा लेट स्कूल आई हैं. उससे तो यही लगता है आप इन्‍सपेकशन  के दिन लेट आई हैं तो प्रतिदिन  तो कई घंटे लेट आती हूंगी. आप इस तरह लेट स्कूल आकर बच्चों का कितना नुकसान कर रही हैं आपको एहसास है? सरकार आपको वेतन क्यों देता है? "अधिकारी का लेक्चर सुनना पड़ा था. और अपनी विवश्‍ता  पर उसकी आंखों में आंसू आ गए. वह क्या उत्‍तर  दे उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. दिन भर इन्‍सपेकशन  चलता रहा परंतु इसका कोई बुशरा  में उलझा रहा. पता नहीं कैसी होगी? बारह बजे के समीप  एक ननवा ने आकर खबर दी कि भिवंडी  से तारिक़ का फोन आया है कह रहे हैं कि तुम तुरंत आ जाओ बुशरा  की तबीयत बहुत खराब है.
उसने तारिक़ को ननवा संख्या दे रखा था ताकि यदि उसे कोई ज़रूरी संदेश देना हो तो वहां संपर्क करे. वे भी उसे तुरंत सूचित कर देते थे. वह तुरंत स्कूल से निकल गई. स्टेशन आकर लोकल में बैठी और स्थानीय चल दी. परंतु थोड़ी दूर जाकर रुक गई.
किसी नेता पर हमला हुआ था. उसके विरोध कर लोगों ने ट्रेन सेवा बंद कर दी थी विरोध करने वालों को पुलिस को पटरियों से हटाने में दो घंटे लग गए उसके बाद ट्रेन चली. थाने से स्पेशल रिक्शा कर वह घर आई तो पता चला बुशरा  को अस्पताल में भर्ती कराया गया. अस्पताल में पलंग पे बुशरा  बेहोश लेटी थी उसके हाथ में सरनज लगी हुई थी उससे कतरा कतरा दवाई टपक कर नली द्वारा उसके शरीर में जा रही थी.
"बुखार बहुत बढ़ गया था इसलिए ऐडमट करना पड़ा." तारिक़ ने बताया तो वह अचानक फूट फूट कर रोने लगी. यह सोचकर कि मरने के बाद तो इंसान केवल एक पल सरा् से गुजरना होगा. परंतु जीते जी इसे कितने पल सरा् से गुजरना पड़ता है?

 
...
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल  09322338918

Hindi Short Story Bidai By M.Mubin


कहानी      विदाई    लेखक  एम मुबीन   


दिन भर एक पीड़ा नअक वातावरण घर पर छाया रहा. इस पीड़ा  को या तो वह महसूस कर रहे थे या फिर उनमें . सकता है जो पड़ोसी के काफी समीप  रहे हैं वह भी पीड़ा  को महसूस कर रहे हूं परंतु वह इस बात का इज़हार नहीं कृपा रहे थे.
अपने पीड़ा  व्यक्त न तो वह कृपा रहे थे और न उनमें . इस पीड़ा  व्यक्त यदि वे करते भी तो किस पर करते? इस पीड़ा  व्यक्त केवल उनमें  पर कर सकते थे परंतु क्योंकि उनमें  स्वंय उस पीड़ा  का शिकार थी इसलिए वह भय से उस पर व्यक्त नहीं कृपा रहे थे कि कहीं उनकी बात सुन कर उनमें  फट न पड़े और उन्हें उसे संभालना मुश्किल न हो जाए.
उनमें  स्वंय उस पीड़ा  का शिकार थी उनमें  दर्द कुछ उनसे अधिक था उनमें  को स्‍वंय  को संभालना मुश्किल हो रहा था. वह भी उनके दुखों को समझ रही थी इसलिए उन पर अपने दुख व्यक्त नहीं कृपा रही थी. उनकी तरह उसे भी डर था कि अगर उसने अपने दर्द का इज़हार पर कर दिया तो उनकी सहन  की शक्ति उत्‍तर  दे देगी और वह बेकाबू हो जाएंगे. और उसके बाद उन्हें काबू में लाना मुश्किल हो जाएगा. दोनों चोर नज़रों से बार बार आदिल के चेहरे को देखते थे. काश एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर पीड़ा  उभर आए जिसमें दोनों गिरफ्तार थे.
अगर एक क्षण के लिए भी आदिल के चेहरे पर पीड़ा  का राय उभरती तो वह समझते उनकी जीवन भर की मुहब्बत, स्नेह और ममता रंग लाई है. आदिल ने अपने नाम की तरह उनके साथ न्याय करते हुए उनकी प्रेम मोहब्बत, ममता और अपनाईत का इक़रार कर लिया है. परंतु दिन भर में एक बार भी एक क्षण के लिए भी आदिल के चेहरे पर ऐसा कोई राय नहीं उभरा था. इस बात का एहसास उनके पीड़ा  को और अधिक बढ़ा रहा था. आदिल के इस रवैये के बाद यह कहकर दिल को बहलाना पड़ रहा था.
"जब अपना ही खून सफेद हो गया है. उसके मन में इतने जित्तण से उसकी परवरिश करने वाले बूढ़े मां बाप के लिए कोई सहानुभूति की भावना नहीं है तो फिर लबनी से क्या शिकायत करें. वह तो पराए है उसने वही रास्ता चुनाजो हर कोई अपने सुख के लिए चिन्ता है. दुख तो इस बात का है कि लबनी चुने रास्ते पर चलने के लिए आदिल तैयार हो गया था. लबनी अपने साथ आए आदमियों को एक चीज़ बता कर उसे ले जाकर नीचे खड़े ट्रक में रखने का आदेश दे रही थी. वह जिस चीज़ की तरफ़ इशारा करती नौकर उस चीज़ को उसकी दी हुई निर्देश के अनुसार उठाकर नीचे रख आते. जब कोई चीज़ उनके घर से निकल कर नीचे खड़े ट्रक में पहोनचाई जाती तो उनके दिल एक ठेस लगती.
चाहे फिर वह लबनी की चीज़ हो. या फिर उनकी अपनी. लबनी यदि उनकी किसी भी चीज़ की तरफ़ इशारा कर के नौकरों को नीचे ट्रक में रख आने के लिए कहती भी तो भी वह उसके विरोध नहीं कर सकते थे. आदिल केवल एक वाक्य ने उनके विरोध का अधिकार भी छीन लिया था.
"अम्‍मी , अब्बा! अगर हम आपकी कोई चीज़ भी ले जा रहे हैं तो परमेश्वर के लिए उस पर आपत्ति कर कोई मतभेद न बढ़ाए. हमारी नयी गहस्थी है हमारे पास गहस्थी के लिए आवश्यक चीजें नहीं हैं, इसलिए जिन चीजों की जरूरत पड़ सकती है ऐसी सभी चीजें ले जा रहे हैं जब वे चीजें हमारे पास आ जाएगी या हम खरीद लेंगे तो हम वे चीजें आपको लौटा देंगे. "
"बेटे! तुम अपनी और हमारी चीज़ों की बात कर रहे हो. यह घर, उस घर की हर चीज़ तुम्हारी है. हमारा क्या है? हमारे जीवन ही कितने दिनों की है? हमारे मरने के बाद तो यह सब तुम्हारा ही होने वाला है. यदि जीवन में तुम्हारा हो गया तो कौन सी बुरी बात है. हमारे पास दो समय की रोटी बनाने के लिए दो बर्तन भी रह गए तो हमारे लिए वही काफी है. "उन्होंने कहा तो सही परंतु उनकी आंखों में आंसू आ गए परंतु इन आंसुओं का न तो आदिल पर कोई असर हुआ और न ही लबनी पर. घर की एक एक वस्‍तु  जाती रही. हर चीज़ जाने के बाद वह उनमें  के चेहरे की समीक्षा करते. उन्हें उनमें  के चेहरे पर दुख के बादल छाए दिखते तो कभी उन्हें उनमें  आँखों में एक विरोध दिखाई देता.
देखो वह मेरी अम्मी का दिया गलदान लिए जा रही है और वह तसबीह मेरे अब्बा मेरे लिए हज से लाए थे, वह पान्दान मेरी बहन मेरे लिए मुरादाबाद से लाई थी, वह तो पान नहीं खाती आधुनिक ज़माने की लड़की जो है. उसे पान्दान की क्या जरूरत? फिर वह पान्दान क्यों लिए जा रही है? उसे पार्टियों, शॉपिंग और सहेलियों के घर जाने से ही फुरसत नहीं मिलती कि कभी एक समय की नमाज़ परख ले. फिर वह तसबीह क्यों ले जा रही है?उसके पास एक से बढ़कर एक कीमती सुधार की चीज़ें हैं फिर वह मेरा गलदान क्यों लिए जा रही है? परंतु उनकी आँखों में देखते ही उनमें  को जैसे आदेश मिल जाता था कि वह विरोध न करे. और उनमें  चाह कर भी विरोध नहीं कृपा रही थी. रात में आदिल ने अपना फैसला उन्हें और उनमें  को सुनाया था.
"अब्बा! आप जानते तो हो ही गया होगा मैंने अपने लिए अलग घर ले लिया है. लबनी और अम्‍मी  की रात दिन की नाचाकी किसी दिन कोई बड़ा हादसा न बन जाए इस भय से मुझे यह कदम उठाना पड़ा. पिछले दिनों घटनाओं में हमारे संबंध तो कुछ तनावपूर्ण हो ही गए हैं. मैं नहीं चाहता कि यह तनाव और बढ़े. और हमारे बीच तलखयाँ बढ़ती जाएं. इसलिए मैंने यह कदम उठाया है. और यह सही है मुझे भी घर की जिम्मेदारी समझने दीजिए लबनी पर भी गहस्थी का बोझ आने दीजिए. हम एक दूसरे से दूर रहेंगे तो हमारे बीच प्यार कायम रहेगी. जब भी एक दूसरे का दिल चाहेगा हम एक दूसरे से मिलने आ जाया करेंगे. आपको मेरे घर आने से कोई नहीं रोके जाएगा उम्मीद है हमारे यहां से जाने के बाद भी आप हमें यहां आने से नहीं रोकें है. "
"तो हम को छोड़ कर जा रहा है, हम? अपने माँ बाप को? उनके माँ आपको जिन्होंने तुझे पैदा किया. पाला, पोसा , पढ़ाया, लिखा और योग्य बनाया कि दुनिया में आज तेरा एक स्थान है. हर कोई तेरा नाम साहित्य से लेता है तो आज अपनी पत्नी के लिए मां बाप को छोड़कर जाने की बात कर रहा है? "
"अम्‍मी ! मेरी बात को समझने की कोशिश क्यों नहीं करतीं. में अपनी जान से ज़्यादा चाहता हूँ और मैं नहीं चाहता हूँ कि मेरी या लबनी की वजह से आपको कुछ हो जाए. इसलिए माता! आप मेरे भावनाओं कोसमझने की कोशिश करें. मैंने जो कदम उठाया है कोई गलत कदम नहीं है. "
"मां बाप, अपने घर को छोड़कर जा रहा है और कह रहा है कोई ग़लत क़दम नही है? यह सब किसके लिए कर रहा है, अपनी पत्नी के लिए नां? अपनी पत्नी के कहने पर तो आज 25 वर्षों का रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार हो गया? इस पत्नी के लिए जिसने अभी तेरे साथ ठीक से छह महीने भी नहीं गुज़ारे हैं अगर तुझे माँ बाप से उतना ही प्यार है जितना प्यार उस समय हमसे जता रहा है तो प्यार का सबूत भी दे. "
उनमें  की बात सुन कर आदिल के चेहरे पर भूकंप के टिप्पणी उभरे.
"उनमें ! तुम चुप रहो." उन्होंने उनमें  को चुप कराया.
"ठीक है पुत्र! अगर तुम्हें इसी में अपनी भलाई होती है तो हम तुम्हारी सुशीों के बीच नहीं आएंगे." उनकी बात सुन कर आदिल तो अपने कमरे में चला गया परंतु आधी रात तक और उनमें  के बीच हुज्जत और तकरार चलती रही.
"आपने उसे इतनी आसानी से घर छोड़कर चले जाने की अनुमति दे दी, आपने उसका अंजाम सोचा है, लोग क्या कहेंगे? यह सब उसकी लगाई आग है हमारी मौजूदगी में उसकी स्वतंत्रता सलब हो जाती है. उसे स्वतंत्रता नहीं मिलती है. जो चाहती है हम कारण नहीं पाती. जब हम ही नहीं होंगे तो उसे हर तरह की स्वतंत्रता मिल जाएगी. वह आदिल को बर्बाद करके रख देगी. ऐसी ऐसी हरकतें करेगी जिन्हें सुनकर हमारा सिर शर्म से झुक जाएगा. अपने करतूतों से वह हमारे परिवार के नाम पर धबह लगा देगी, वह आदिल को बर्बाद कर देगी. "
"जब वह हमारे घर में नहीं रहेगी तो फिर उसकी हरकतों से हमें क्या लेना देना? और आदिल कोई दूध पीता बच्चा नहीं है. उसे अच्छे बुरे की तमीज़ है. ग़लत बातों पर उसे रोके है."
"अरे क्या उसे रोके है, अगर उसे इतनी ही तमीज़ होती तो वह उसके कहने पर घर छोड़ने की बात नहीं करता."
"अगर वह आज कोई गलती कर रहा है तो जब उसे अपनी गलती का एहसास हो तो अपनी इस गलती पर नादम भी होगा."
"अपनी ग़लती पर लज्जा पता नहीं कब उसे महसूस हो परंतु आज तो वह अपनी जीवन नष्ट कर रहा है."
"हम ने जीवन भर उसे उंगलियां पकड़ कर चलना सिखाया परंतु आज वह इतना बड़ा हो गया है कि उसे हमारी मार्गदर्शन की जरूरत नहीं है. इसलिए उसने जो रास्ता चुना होगा ठीक ही होगा." यूँ वह आदिल के फ़ैसले को सही साबित करने की कोशिश कर रहे थे परंतु आदिल के इस फैसले ने एक बारूद का काम करते हुए उनके अस्तित्व की धज्जियां उड़ा दी थीं. उनका वह बेटा उनसे अलग हो रहा था. जिसे एक क्षण के लिए भी वह अपनी नज़रों से दूर नहीं करते थे. परंतु क्या कर सकते थे? वह अपने आप को बड़ा लाचार और बेबस महसूस कर रहे थे. अगर वह आदिल के इस फैसले का विरोध करते तो उनमें  को मुख्य मिल जाती उनमें  आदिल के अलग होने के पक्ष में नहीं थी. और एक तज़ाद खड़ा हो जाता.
लबनी और आदिल किसी भी सूरत में उनके साथ रहने के लिए तैयार नहीं होते और वे इसके लिए तैयार नहीं होते तो तज़ाद बढ़ता. प्राप्त यही होता कि जीत आदिल और लबनी की होती उन्हें और उनमें  को हआभमत उठानी पड़ती. और लोगों को तमाशा देखने का मौका मिल जाता. इसलिए अपने दिल पर पत्थर रखते हुए उन्होंने आदिल के फैसले को स्वीकार किया था.
रात न वह सो सके और न ही उनमें  सो सकी. देर रात तक आदिल के कमरे से और लबनी की खुसर पसर की आवाज़ें आती रहीं. पलंग पर वह चुप चाप चित लेटे छत को ताकते रहे. उनमें  दूसरी तरफ करवट लिए दीवार ताकत रही. दोनों के मन में एक तूफान उठा रहा. उनकी आंखों के सामने आदिल के जन्म से ता दम तक एक एक क्षण, एक घटना किसी फ़िल्म की तरह चकरा रहा.
कितनी मन्नतों, मुरादों, मुश्किलों और मुसीबतों के बाद आदिल का जन्म हुआ था. विवाह  के पांच साल के बाद भी जब उनके घर कोई औलाद नहीं हुई तो वह औलाद की खुशी से निराश हो गए थे. दोनों ने अपना चेकअप कराया था डॉक्टरों ने बताया था कि उनमें कोई कमी नहीं है. फिर भी वह बच्चों के सुख से वंचित थे. उसे उनकी तक़दीर कम नसीब समझा जाए या कुदरत का मज़ाक़ या संकट. हजारों उपचार, मन्नतों और मुरादों के बाद उनके बाप बनने की खुश खबरी मिली थी. इस खबर को सुन कर उनकी हालत पागलों सी हो गई थी. उनमें  से उसकी खुशी संभाले नहीं संभल रही थी. उनके करीबी रिश्तेदार और कृपया फरमाउं में भी इस खबर को सुनकर खुशीलहर दौड़ गई थी. उन्होंने सबसे पहले यह खबर उन्हें सुनाई थी. क्योंकि उनकी बातें पाँच सालों तक उनके लिए उनमें  के लिए बड़ी अदिति का कारण बनी थीं. लोग हज़ारों तरह की बातें करते थे. कभी कहते उनमें  में कोई कमी है, कभी किसी कमी का आरोप लगाते. कभी कहते दोनों स्‍वंय  अब बच्चा नहीं चाह रहे हैं कुछ दिन और ऐयाशी  करना चाहते हैं. कभी उन्हें सलाह देते उनमें  उन्हें औलाद का सुख नहीं दे सकती. औलाद के लिए वह दूसरी विवाह  कर लें.
कभी उनमें  को समझाते उनसे उसे औलाद नहीं हो सकती इसलिए उनके पीछे वह क्यों जीवन तबाह कर रही है. अभी से संभल जाए और होश से काम ले उसकी अच्छी खासी नौकरी है वह स्‍वंय  कफ़ेल है. चाहे तो उनसे तलाक लेकर किसी पुरुष से विवाह  कर सकती है जो उसे औलाद का सुख दे. कभी उड़ाते कि दोनों नौकरी पेशा है. घर में कोई ऐसा नहीं है जो उनके बाद बच्चे की देखरेख करें इसलिए इस ज़िम्मेदारी से घबरा कर चाहते हैं कि उन्हें औलाद न हो.
जब भी वह किसी की बात सुनते उनके दिल को चोट सी लगती. उनमें  की आँखों से टिप टिप आँसू गिरने लगते और दहाड़ें मार मार कर रोने लगती और उनमें  को संभालना मुश्किल हो जाता. वह भुराई आवाज़ में कह उठती.
"मुझ में ही कोई कमी है. आपको औलाद का सुख नहीं दे सकती आप मेरे पीछे जीवन बर्बाद न करें और किसी दूसरी लड़की से विवाह  कर लें. ताकि वह आपको औलाद का सुख दे सके." उनमें  को लाउत्‍तर  करने के वह उनमें  के शब्द उसे लूटा देते तो उनमें  तड़प उठती.
"भगवान के लिए ऐसी बातें मुंह से न नकालए. एक क्षण के लिए भी आप से अलग होने की कल्पना नहीं कर सकती." इतने सालों से बाद उन्हें औलाद का सुसमाचार मिली थी.
आदिल की जन्म भी परीक्षा से कम नहीं थी. एक आग का दरिया था जिसे दोनों पार करना था. आदिल की जन्म के बाद ऐसे हालात पैदा हो गए कि उनमें  जीवन खतरे में पड़ गई.
आखिर ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने उनमें  और आदिल दोनों को बचा लिया परंतु इस कीमत पर कि उनमें  अब कभी मां नहीं बन पाएगी.
आदिल को पाकर उन्होंने खुशी खुशी यह रकम भी अदा कर दी. आदिल को पाकर उन्हें लगा जैसे उन्हें विश्व की सबसे बड़ी नेमत मिल गई. उसके बाद उनके मन में परमेश्वर की किसी नेमत की तमन्ना ही नहीं है. तीन महीनोंतक उनमें  घर में रही. उसके बाद आदिल को छोड़कर स्कूल जाने का कड़ा परीक्षा आगया. भावनाओं में यह फैसला भी किया गया कि आदिल के लिए उनमें  नौकरी छोड़ दे. क्योंकि उनका ऑफिस में दिल नहीं लगता है. आदिल में ही ध्यान लगा रहता है. परंतु यह तय किया गया कि आदिल की भलाई के लिए जीवन संवारने के लिए उनमें  नौकरी जारी रखेगी क्योंकि यह तय किया गया उनमें  एक एक पैसा आदिल की जाति पर खर्च कर उसे एक नेक, सालेह, अच्छा और सफल इंसान बनाया जाएगा. आदिल कभी नौकरों, पड़ोसियों या कभी रिश्तेदारों के पास छोड़ कर दोनों ड्यूटी पर निकल जाते. ऑफिस में उनका दिल नहीं लगता था. नज़रें घड़ी की सोईों पर लगी रहती थीं. जिस समय घड़ियाँ वह घंटा बताती जब उनमें  स्कूल से घर आ जाती तो उन्हें आराम मिल जाता.
अब आदिल सही हाथों में पहुँच गया है. अब चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. जैसे आदिल बड़ा हो रहा था इसके लिए उनके दिल में प्यार बढ़ती जा रही थी. उसकी मासूम हरकतें, आवाज़ें, बातों से अधिकार इस के लिए दिल में प्यार उमड़ आता था और वह उसे लिपटा लेते थे.
आदिल को मामूली छींक भी आ जाती तो उनका दिल चिंता से ग्रस्त हो जाता था. आदिल के शरीर का तापमान मामूली भी बढ़ जाता तो उनकी सारी रात आंखों में कट जाती थी. आदिल को मामूली बुखार भी आ जाता तो बड़े से बड़े डॉक्टर का इलाज कराया जाता.
बड़ा हुआ तो शिक्षा की चिंता सताने लगी. उसे सबसे अच्छे स्कूल में भर्ती किया गया और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा. दो घंटे उसे पढ़ाते थे और दो घंटे उनमें . वैसे आदिल काफी बुद्धिमान था. फिर उनकी प्रशिक्षण और शिक्षा तो सोने पर सहाथान का काम करने लगी. वह हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल आता. इसका नतीजा यह निकला कि दसवीं परीक्षा में बोर्ड के पहले दस सफल छात्रों में स्थान पा गया.
आदिल सिविल इंजीनियर बनना चाहता था. उन्होंने भी उसकी इच्छा के आगे अपना सिर खुम किया. उन्होंने आदिल के बारे में बहुत कुछ सोच रखा था परंतु वह आदिल की ईच्‍छा के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं करना चाहते थे आदिल की रुचि का ही काम करना चाहते थे अच्छे नंबरों के कारण उसे आसानी से एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया. पढ़ाई में वह तेज था अपने लेख में बहुत मेहनत करने लगा.
द्वारा शिक्षा रहते हुए भी वे एक सिविल इंजीनियर के पास जाने लगा और वह काम करने लगा जिसे उसे परीक्षा पास करने के बाद करना था. दो तीन सालों में ही वह अपने क्षेत्र का इतना माहिर हो गया कि बड़े से बड़े इंजीनियर भी उसका मुक़ाबला नहीं कर पाए थे. उसके बनाए योजना, नकशों और खाकों में कोई भी गलती नहीं निकाल पाता था. नक्शे, चित्र और योजना वह करता था परंतु इस पर मुहर किसी और की लगती थी. बाद में नकशों पर बनने वाली इमारतें भी इसी द्वारा निगरानी निर्माण होती थी.
डिग्री मिलने से पहले ही उसका इतना नाम हो गया था और उसे इतना अनुभव प्राप्त हो गया था जिसे पाने में औरों को कई साल लग जाते थे. परीक्षा में शामिल नंबरों से सफल रहा. उसके सफल होते ही एक बहुत बड़ी कंस्ट्रक्शन फर्म उसे नौकरी मिल गई. अच्छी वेतन के साथ उसे गाड़ी और बंगला मिला. परंतु उसने बांग्लादेश यह कहकर लौटा दिया कि अपनी अम्मी और अब्बा के साथ उस छोटे से घर में रह कर उनके सारे सपने पूरे कर उनकी सेवा करना चाहता हूँ जो उन्होंने मेरे लिए देखे हैं.
एक सपूत बेटे की तरह वह अपनी सारी वेतन लाकर उन्हें दे देता था. ऑफिस से आने के बाद भी उनके घर आदिल से मिलने वालों का मेला लगा रहता था. वे चाहते थे कि आदिल कार्यालय से आने के बाद उनका कामकरे. वह उनका काम करता तो उसे जितनी वेतन मिलती थी उससे अधिक पैसा मिल जाता था. कई लोगों ने सुझाव दिया कि वह नौकरी छोड़कर अपना स्‍वंय  का कारोबार शुरू कर दे. यह कोई मुश्किल काम नहीं था.
अंत आदिल ने अपना अलग व्यवसाय शुरू कर दिया और दिन दोनिय रात चौगनी उन्नति करने लगा. इस बीच दोनों रिटायर हो गए थे. इन सभी सफलताओं के बाद माँ बाप का बच्चों के लिए बस एक ही अंतिम सपना होता है. औलाद का श्रेय देखे और बहू को घर देखने का सपना. यह सपना भी पूरा हो गया. लबनी बहू बनकर उनके घर आ गई. लबनी एक बहुत अमीर कबीर घराने की चश्म और चिराग थी. खूबसूरत इतनी कि उसकी सुंदरता के सारे शहर में चर्चे थे. ऐसी पत्नी पाकर कौन खुश नहीं हो सकता था. परंतु कुछ दिनों में ही उन्होंने महसूस किया कि लबनी और उनमें  के विचारों में ज़मीन आसमान का अंतर है. जो बातें लबनी को पसंद थीं वह उनमें  को पसंद नहीं थीं. उनमें  लबनी को जिस रूप में देखना चाहती थी वह लबनी के लिए एक दकियानूसी रूप था.
पहले दबे शब्दों में बाद में ऊँची आवाज़ में मुद्दों पर दोनों में बहस व तकरार हुई. ऐसी हालत में वह मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए भी उनमें  को दबाते थे. आदिल भी तमाशाई बना रहता. कभी लबनी की जिम्मेदारी करते हुए मां को समझाता कि वह बड़ी है उसे उन छोटी बातों को अनदेखा कर देना चाहिए. या फिर कभी माँ का पक्ष करता.
आखिर वही हुआ जिसके कल्पना से ही कभी कभी वह कांप उठते थे. आदिल और लबनी ने अलग रहने का फैसला कर लिया. और वह घर छोड़ कर जा रहे थे. और घर पर एक पीड़ा नअक सन्नाटा छाया हुआ था. उनके अंदर दर्द का नदी ठाठें मार रहा था रात तक वही सन्नाटा घर में बरकरार रहा.
"आदिल हमें छोड़कर चला गया, उसने पत्नी के लिए हमें छोड़ दिया, हमारी मोहब्बतों का हमें यह सिला दिया? आखिर हमारी प्यार में ऐसी क्या कमी रह गई थी जो उसे बांध कर हमारे पास नहीं रख सकती थी." उनमें  घर की दीवारों को घूरते हुए पागलों की तरह बड़बड़ा रही थी. "अब उसके जाने का गम न करो और स्‍वंय  को संभाल." उन्होंने उसे समझाया. समझ लो ख़ुदा ने हमें बेटा नहीं बेटी दी थी. बेटी तो पराए अमानत होती है. एक न एक दिन तो उसे अपने घर जाना होता है. समझ लो आज हमारी बेटी की विवाह  हो गई है और आज वह हमसे बिछड़ कर अपने घर चली गई है. "उनकी इस बात को सुनते ही उनमें  फूट फूट कर रोने लगी.
पता नहीं यह किसके ोसाल के आंसू थे. बेटे या बेटी के?

अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल  09322338918

Hindi Short Story Rehai By M.Mubin


कहानी      रिहाई    लेखक  एम मुबीन   

दोनों चुपचाप पुलिस स्टेशन के कोने में रखी एक बेंच पर बैठे साहब के आने का इंतजार कर रहे थे. उन्हें वहां बैठे तीन घंटे हो गए थे. दोनों में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक दूसरे से बातें करें. जब भी दोनों एक दूसरेको देखते और दोनों की नज़रें मिनतीं  तो वह एक दूसरे को दोषी मानते.
दोनों में से दोष किसका था, वह स्‍वंय  अभी तक यह तय नहीं कर पाए थे. कभी लगता वे अपराधी हैं कभी लगता जैसे एक पाप के आरोप  में दूसरे को सज़ा मिल रही है. समय गुजारे के लिए वह अंदर चल रही गतिविधियों की समीक्षा करते. उनके लिए यह जगह बिल्कुल अजनबी थी. दोनों को याद नहीं आ रहा था कि कभी उन्हें किसी काम से भी उस जगह या ऐसी जगह जाना पड़ा था. या कभी जाना पड़ा हो तो भी वह स्थान ऐसा नहीं था .
सामने लॉक अप था. छ सलाखों वाले दरवाजे और दरवाजों के छोटे छोटे कमरे. हर कमरे में आठ दस लोग बंद थे. कोई सो रहा था तो कोई ऊँघ रहा था, कोई आपस में बातें कर रहा था तो कोई सलाखों के पीछे से झांक कर कभी उन्हें तो कभी पुलिस स्टेशन में आने वाले सिपाहियों को देख कर भददे अंदाज़ में मुस्कुरा रहा था.
उनमें से कुछ के चेहरे इतने भयानक और कर्कश थे कि उन्हें देखते ही अंदाज़ा हो जाता था कि उनका संबंध अपराधियों से है या वह स्‍वंय  अपरधी हैं. परंतु कुछ चेहरे बिल्कुल उनसे मिलते जुलते थे. मासूम भोले भाले. सलाखों के पीछे से झांक कर बार बार उन्हें देख रहे थे. जैसे उनके भीतर उत्सुकता जागा है.
"तुम लोग शायद हमारे समुदाय से संबंध रखते हो. तुम लोग यहां कैसे ऑन फंसे?"
 वह जब भी चेहरों को देखते तो दिल में एक ही विचार आता कि देखने में  तो यह भोले भाले मासूम और शिक्षित लोग लगते हैं यहां कैसे  इस नरक में ऑन फंसे.
बाहर दरवाजे पर दो बंदूक धारी  पहरा दे रहे थे. लॉक आपके पास भी दो सिपाही बंदूक लिए खड़े थे. कोने वाली मेज़ पर एक वर्दी वाला लगातार कुछ लिख रहा था. कभी कोई सिपाही आकर उसकी मेज़ के सामने वाली कुर्सी पर बैठ जाता तो वह अपना काम छोड़ कर उससे बातें करने लगता. फिर उसके जाने के बाद अपने काम में व्यस्त हो जाता था.
उसके बाजू में एक मेज़ खाली पड़ी थी. उस मेज़ पर दोनों के ब्रेफ केस रखे हुए थे. उनके साथ और भी लोग रेलवे स्टेशन से पकड़ कर लाए गए थे उनका सामान भी उसी मेज़ पर रखा हुआ था. वे भी साथ ही बेंच पर बैठे थे परंतु किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक दूसरे से बातें कर सके. एक दो बार इनमें से कुछ लोगों ने आपस में बातें करने की कोशिश की थी. उसी समय सामने खड़ा सिपाही गरज उठा.
"हे चुप! आवाज़ मत निकालो, शोर मत करो. यदि शोर किया तो लॉक अप में डाल दूंगा."
इसके बाद उन लोगों ने कानाफूसी में भी एक दूसरे से बातें करने की कोशिश नहीं की थी. वह सब एक दूसरे के लिए अजनबी थे. या संभव है एक दूसरे केा  जानते हों जिस तरह वह और अशोक एक दूसरे के जान पहचानवाले  थे. ना केवल जान पहचान वाले  बल्कि दोस्त थे. एक ही ऑफिस में वर्षों से काम करते थे और साथ ही इस संकट  में गिरफ्तार हुए थे.
आज जब दोनों ऑफिस से निकले थे तो दोनों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह संकट  में गिरफ्तार हो जाएंगे.
ऑफिस से निकलते हुए अशोक ने कहा था. "मेरे साथ जरा बाजार चलोगें ? एक छुरी का सेट खरीदना है. पत्नी कई दिनों से कह रही है, परंतु व्यस्तता के कारण बाजार तक जाना नहीं हो रहा है."
"चलो!" उसने घड़ी देखते हुए कहा. मुझे सात बजे की तेज लोकल पकड़ना है और अब छह बज रहे हैं. इतनी देर में हम यह काम निपटा सकते हैं. "वह अशोक के साथ बाजार चला गया था.
एक दुकान से उन्होंने छु‍िरयों का सेट खरीदा था. उस सेट में विभिन्न आकार की आठ दस छुरियां थीं. उनकी धार बड़ी तेज थीं और दुकानदार का दावा था प्रतिदिन  उपयोग के बाद भी दो सालों तक उनकी धार खराब नहीं होगी क्योंकि यह स्टेन लैस स्टील की बनी हुई हैं मूल्य भी वाजिब था.
भुगतान कर अशोक ने सेट अपनी अटैची में रखा और वह बातें करते हुए रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए. स्टेशन पहुंचे तो सात बजने में बीस मिनट बाकी थे दोनों की तेज लोकल के आने में पूरे बीस मिनट बाकी थे.
तेज ट्रेन वाले प्लेटफार्म पर अधिक भीड़ नहीं थी धीमी ट्रेन वाले प्‍लेटफार्म  पर अधिक भीड़ थी लोग शायद बीस मिनट तक किसी गाड़ी का इंतजार करने की तुलना में धीमी गाड़ियों से जाना पसंद कर रहे थे.
अचानक वह चौंक पड़े. प्‍लेटफार्म  पर पूरी पुलिस  फोर्स   आई थी. और उसने प्‍लेटफार्म के हर व्यक्ति को अपनी जगह स्तब्ध कर दिया था. दो तीन सिपाही आठ आठ दस दस लोगों को घेर लेते उनसे पूछताछ कर उनके सामान और सूट केस, अटैचयों की तलाशी लेते कोई संदेहास्पद   वस्तु न मिलने की स्थिति में उन्हें जाने देते या यदि उन्हें कोई संदिग्ध या ईच्छि‍त  वस्तु मिल जाती तो तुरंत दो सिपाही उस व्यक्ति को पकड़ कर प्‍लेटफार्म से बाहर खड़ी पुलिस जीप में बिठा आते.
उन्हें भी तीन सिपाहियों ने घेर लिया था.
"क्या बात है हवलदार साहब?" उसने पूछा. "यह तलाशियां क्यों ली जा रही हैं?"
"हमें पता चला है कि कुछ आतंकवादी   इस समय प्‍लेटफार्म से हथियार ले जा रहे हैं. उन्हें गिरफ्तार करने के लिए यह कार्रवाई की जा रही है." सिपाही ने उत्‍तर  दिया.
वह कुल आठ लोग थे जिन्हें उन सिपाहियों ने घेर रखा था उनमें से चार की तलाशियां हो चुकी थीं और उन्हें छोड़ दिया गया था. अब अशोक की बारी थी.
शारीरिक तलाशी लेने के बाद अशोक को ब्रेफ केस खोलने के लिए कहा गया. ब्रेफ केस खोलते ही एक दो चीजों को उलट पलट कर देखने के बाद जैसे ही उनकी नज़रें छु‍िरयों के सेट पर पड़ी वह उछल पड़े.
 "बाप रे इतनी छुरियां? साब हथियार मिले हैं. "एक ने आवाज देकर थोडी दूर खडे इन्सपेक़्टर को बुलाया.
"हवलदार साहब यह हथियार नहीं हैं. सब्जी तरकारी काटने की छु‍िरयों का सेट है." अशोक ने घबराई हुई आवाज़ में उन्हें समझाने की कोशिश की.
"हां हवलदार साहब यह घरेलू उपयोग की छु‍िरयों का सेट है हमने अभी बाजार से खरीदा है." उसने भी अशोक की सफाई पेश करने की कोशिश की.
"तो  तू भी इसके साथ है, तू भी इसका साथी है?" कहते हुए एक सिपाही ने तुरंत उसे दबोच लिया. दो सिपाही पहले ही अशोक को दबोच चुके थे. "हम सच कहते हैं हवलदार साहब यह हथियार नहीं हैं यह घरेलू उपयोग की छु‍िरयों का सेट है." अशोक ने एक बार फिर उन लोगों को समझाने की कोशिश की.
"चुप बैठ!" एक जोरदार डंडा उसके सिर परपड़ा.
"हवलदार साहब आप मार क्यों रहे हैं?" अशोक ने विरोध किया.
"मारें नहीं तो क्या तेरी पूजा करें. यह हथियार साथ लिए फिरता है. दंगा  फसाद  करने का इरादा है. ज़रूर तेरा संबंध आतंक  संगठनों से है." एक सिपाही बोला और दो सिपाही उस पर डंडे बरसाने लगे. उसने अशोक को बचाने की कोशिश की तो उस पर भी डंडे पडने लगे. उसने खैरियत इसी में समझी कि चुप रहे. दो चार डंडे उस पर पड़ने के बाद हाथ रुक गया. परंतु अशोक का बुरा हाल था. वह जैसे ही कुछ कहने के लिए मुंह खोलता उस पर डंडे बरसने लगते और विवश उसे चुप होना पड़ता.
"क्या बात है?" इस बीच इंस्पेक्टर वहां पहुंच गया जिसे उन्होंने आवाज दी थी.
"साब उसके पास हथियार मिले हैं."
"उसे तुरंत थाने ले जाओ." इन्‍सपेक्‍टर  ने आदेश दिया और दूसरी ओर बढ़ गया. चार सिपाहियों ने उन्हें पकड़ा और घसीटते हुए प्लेटफार्म के बाहर ले जाने लगे. बाहर एक पुलिस जीप खड़ी थी. इस जीप में उन्हें बिठा दिया गया जीप में दो चार आदमी बैठे थे. इन सब को चार सिपाहियों ने अपनी सुरक्षा में ले रखा था. उसी समय जीप चल पड़ी.
"आप लोगों को किस आरोप में गिरफ्तार किया गया है?" जैसे ही उन लोगों में से एक आदमी ने उनसे पूछने की कोशिश की एक सिपाही का फ़ोलादी मक्का उसके चेहरे पर पड़ा.
"चुपचाप बैठा रह नहीं तो मुंह तोड़ दूँगा." इस आदमी के मुंह से खून निकल आया था वह अपना मुँह पकड़ कर बैठ गया. और मुंह से निकलते खून को जेब से रूमाल निकाल कर साफ करने लगा.
पुलिस स्टेशन लाकर उन्हें उस कोने की खंडपीठ पर बैठा दिया गया और उनका सामान उस मेज़ पर रख दिया गया जो शायद इंस्पेक्टर की थी. जब वह पुलिस स्टेशन पहुंचे तो निरंतर लिखने वाले ने लाने वाले सिपाहियों से पूछा.
"ये लोग कौन हैं? उन्हें कहां से ला रहे हो?"
"रेलवे स्टेशन पर छापे के दौरान पकड़े गए हैं उनके पास से संदिग्ध चीजें या हथियार बरामद हुए हैं."
"फिर उन्हें यहाँ क्यों बैठा रहे हो? उन्हें लॉक अप में डाल दो."
"साहब ने कहा है कि उन्हें बाहर बिठा कर रखो वह आकर उनके बारे में फैसला करेंगे." बेंच पर बैठा पहले उनकी अच्छी तरह तलाशी ली गई थी. कोई संदेहास्पद वस्‍तु  बरामद नहीं हुई यही गनीमत था. उनकी पुलिसस्टेशन आने की थोड़ी देर बाद दूसरा जथा पुलिस स्टेशन पहुंचा. वह भी आठ दस लोग थे शायद उन्हें किसी दूसरे इंस्पेक्टर ने पकड़ा था इसलिए उन्हें दूसरे कमरे में बिठाया गया. और भी इस तरह के कितने लोग लाए गए उन्हें अंदाज़ा नहीं था क्योंकि वह केवल कमरे की गतिविधियां देख पा रहे थे जिसमें वह मकीद थे.
नए सिपाही आते तो उन पर एक उचटती नज़र डालकर अपने साथियों से पूछ लेते. "यह कहां से पकड़े गए हैं. जुए घर से, ब्लू फिल्म देखते हुए या वेश्‍याओं के अड्डों से?"
"हथियारों की खोज में. आज रेलवे स्टेशन पर छापा मारा था. वहां पर पकड़े गए हैं."
"क्या बरामद हुआ?"
"पर्याप्त तो कुछ भी बरामद नहीं हो सका. खोज जारी है. साब अभी नहीं आए हैं. आईं तो पता चलेगा कि खबर सही थी या गलत और छापे से कुछ हासिल हुआ है या नहीं?"
जैसे जैसे समय बीत रहा था उसके दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. अशोक की हालत गैर थी. उसके चेहरे पर उसके दिल की स्थिति उभर रही थी. हर क्षण ऐसा लगता था जैसे वह अभी चकरा कर गिर जाएगा. उसे अनुमान था जो भय से डर रहा है अशोक की आशंकाएं कुछ अधिक ही होंगे. उसे इस बात का संतोष था तलाशी में उसके पास से कोई भी संदेहास्पद वस्तु बरामद नहीं हुई थी. इसलिए न तो पुलिस इस पर कोई आरोप लगा सकती है न उस पर हाथ डाल सकती है. परंतु संकट  यह थी कि वह अशोक के साथ गिरफ्तार हुआ है. अशोक पर जो भी आरोप पत्र लगाया जाएगा इसमें उसे भी बराबर का हिस्सा दिया जाएगा. कभी कभी उसे गुस्सा आ जाता .
'आखिर हमें किस अपराध में गिरफ्तार किया गया है, किस अपराध में हमारे साथ आदी अपराधियों सा अपमान जनक व्‍यवहार किया जा रहा है और यहां घंटों से बिठा कर रखा गया है और हमे अपमानित  की जा रही है? हमारे पास तो ऐसी कोई संदेहास्पद  आपत्तिजनक  वस्‍तु  बरामद नहीं हुई है. वह छु‍िरयों का सेट? वह तो घरेलू उपयोग की चीजें हैं. उन्हें अपने पास रखना या कहीं ले जाना कोई अपराध नहीं है. अशोक इन चीजों से कोई हत्या और रक्तपात या दंगा फसाद नहीं करना चाहता था वह तो उन्हें अपने घर अपने घरेलू उपयोग के लिए ले जाना चाहता था. "परंतु किससे ये बातें कहे, किस के सामने अपनी बेगुनाही की सफाई पेश करे. यहां तो आवाज़ भी मुँह से निकलती है तो उत्‍तर  में कभी गालियां मिलती हैं तोकभी घूँसे. इस संकट  से कैसे छुटकारा मिल दोनों अपनी अपनी तौर पर सोच रहे थे जब सोचों से घबरा जाते तो कानाफूसी में एक दूसरे से एक दो बातें कर लेते.
"अनवर अब क्या होगा?"
"कुछ नहीं होगा अशोक! तुम धैर्य  रखो. हमने कोई अपराध नहीं किया है."
"फिर हमें यहां यूँ क्यों बिठा कर रखा गया है. हमारे साथ आदी अपराधियों का व्यवहार क्यों किया जा रहा है?"
"यहाँ के रूप तरीके ऐसे ही हैं. अब हमारा केस किसी के सामने गया भी नहीं है."
"मेरा साला  स्थानीय एम. एल. ए का दोस्त है. उसे फोन करके सारी बातें बता दें, वह हमें इस नरक से मुक्ति  दिला देगा."
"पहली बात तो ये लोग हमें फोन करने नहीं देंगे. फिर थोड़ा धैर्य  रखो इंस्पेक्टर के आने के बाद क्या स्थिति पैदा होती है उस समय इस बारे में सोचेंगे."
"इतनी देर हो गई घर न पहुंचने पर पत्नी चिंतित हो गयी."
"मेरी भी यही स्थिति है. एक दो घंटे लेट हो जाता हूँ तो वह घबरा जाती है. इन लोगों का कोई भरोसा नहीं कुछ न मिलने की स्थिति में किसी भी आरोप में फंसा देंगे."
"अरे सब उनका पैसा खाने के लिए यह नाटक रचाया गया है." बगल में बैठा आदमी उनकी कानाफूसी  की बातें सुनकर फुसफुसाया. "कड़की लगी हुई है किसी अपराधी से हफता  नहीं मिला होगा या उसने हफता  देने से इन्‍कार कर दिया होगा. उसके विरूध  तो कुछ नहीं कर सकते उसकी भरपाई करने के लिए हम शरीफों को पकड़ा गया है. "
"तुम्हारे पास क्या मिला?" उसने पलट कर उस आदमी से पूछा.
"एसिड की बोतल." वह आदमी बोला. "उस एसिड से मैं अपने बीमार पिता के कपड़े धोता हूं जो कई महीनों से बिस्तर पर है. उसकी बीमारी के जीवाणु मर जाएं उनसे किसी को नुकसान न पहुंचे इसके लिए डॉक्टर ने उसके सारे कपड़े इस एसिड में धोने के लिए कहा है. आज एसिड समाप्त हो गया था वह मेडिकल स्टोर से खरीद कर ले जा रहा था. मुझे क्या पता था इस संकट  में पड़ जाऊँगा. वरना मैं अपने घर के पास के मेडिकल स्टोर से खरीद लेता. "
"हे! क्या खुसर पुसर चालू है?" उनकी कानाफूसी सुनकर एक सिपाही दहाड़ा तो वह सहम कर चुप हो गए. मन में फिर अशंकाएं सिर उठाने लगे. यदि अशोक पर कोई   अपराध लगा के गिरफ़्तार कर लिया गया तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा. अशोक की मदद करने वाला साथी उसे करार देकर इस पर भी वही आरोप पत्र लगाना कौन सी बड़ी बात है. पुलिस तो उन पर आरोपपत्र लगा उन्हें अदालत में पेश कर देगी. उन्हें अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी. और भी अपराध को साबित करने में सालों लग जाएंगे. वर्षों अदालत कचहरी के चक्कर. इस कल्पना से ही उसे झुरझुरी आ गई. फिर लोग क्या कहेंगे किस किस को वह अपनी बेगुनाही की दास्तान सुना कर अपनी सफाई पेश करेंगे.
अगर पुलिस ने उन पर आरोप पत्र लगा तो मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहेगा. पुलिस उनके बारे में बढ़ा चढ़ा कर अखबारों में भी उनके अपराध की कहानी छपवा देगी. अखबार वाले तो इस तरह की कहानियों की ताक में रहते हैं.
"दो सफेद पोशों के काले कारनामे."
"एक कार्यालय में काम करने वाले दो क्लर्क आतंकवादियों के साथी निकले."
"एक कुख्यात गिरोह से संबंध रखने वाले दो गुंडे गिरफ्तार."
"दंगे  के लिए हथियार ले जाते हुए दो गुंडे गिरफ्तार."
"शहर के दो शरीफ लोगों का संबंध खतरनाक आतंकवादी   संगठनों से निकला." इन बातों को सोच कर वह अपना सिर पकड़ लेता. जैसे जैसे समय बीत रहा था. उसकी हालत खराब  हो रही थी और उसे इन बातों विचारों से छुटकारा पाना मुश्किल हो रहा था.
ग्यारह बजे के समीप  इंस्पेक्टर आया वह गुस्से में भरा था.
"नालायक, पाजी, हरामी, साले कुछ भी झूठी खबर  देकर हमारा समय खराब करते हैं. सूचना है कि आतंकवादी   रेलवे स्टेशन से खतरनाक हथियार लेकर जाने वाले हैं. कहां हैं आतंकवादी  , कहां है हथियार? चार घंटे रेलवे स्टेशन पर मगज़ पाशी करनी पड़ी. रामू यह कौन लोग हैं? "
"उन्हें रेलवे स्टेशन पर शक में गिरफ्तार किया गया था."
"एक एक को मेरे पास भेजा."
एक आदमी उठ कर इंस्पेक्टर के पास जाने लगा और सिपाही उसे बताने लगे कि इस व्यक्ति को किस लिए गिरफ्तार किया गया है.
"उसके पास से एसिड की बोतल मिली है."
"साहब वह एसिड घातक नहीं है. इससे मैं अपने बीमार पिता के कपड़े धोता हूं. वह एक मेडिकल स्टोर से खरीदी थी. उसकी रसीद भी मेरे पास है और जिस डॉक्टर ने यह लिख कर दी है डॉक्टर की स्टेटमैंट भी. यह कीटनाशक एसिड है. बर्फ की तरह ठंडा. "वह व्यक्ति अपनी सफाई पेश करने लगा.
"जानते हो एसिड लेकर लोकल ट्रेन में यात्रा करना अपराध है?"
"जानता हूँ साहब! परंतु यह एसिड आग लगाने वाला नहीं है."
"अधिक मुंह ज़ोरी मत करो. तुम्हारे पास एसिड मिला है. हम तुम्हें एसिड लेकर यात्रा करने के जुर्म में गिरफ्तार कर सकते हैं."
"अब मैं क्या कहूं साहब!" वह आदमी विवश्‍ता  से इंस्पेक्टर का मुंह ताकने लगा.
"ठीक है तुम जा सकते हो परंतु भविष्य एसिड लेकर ट्रेन में यात्रा नहीं करना."
"नहीं साहब अब तो ऐसी गलती फिर कभी नहीं होगी." कहता हुआ वह आदमी अपना सामान उठाकर तेजी से पुलिस स्टेशन के बाहर चला गया.
अब अशोक की बारी थी.
"हम दोनों एक कंपनी के सेल्‍स  विभाग में काम करते हैं. यह हमारे कार्ड है. कहते अशोक ने अपना कार्ड दिखाया मैंने छु‍िरयों का सेट घरेलू उपयोग के लिए खरीदा था और घर ले जा रहा था. आप देखिए यह घरेलू उपयोग कीछरियां हैं.
"साब उनकी धार बहुत तेज है." बीच में सिपाही बोल उठा.
इंस्पेक्टर एक छुरी उठाकर उसकी धार परखने लगा.
"सचमुच उनकी धार बहुत तेज है. उनके एक ही वार से किसी की जान भी ली जा सकती है."
"इस बारे में क्या कह सकता हूं साहब!" अशोक बोला. "कंपनी ने इस तरह की धार बनाई है. कंपनी को इतनी तेज धार वाली घरेलू उपयोग की छुरियां नहीं बनानी चाहिए."
"ठीक है तुम जा सकते हो. इंस्पेक्टर अशोक से बोला और उससे संबोधित हुआ.
"तुम?"
"साहब यह इसके साथ था."
"तुम भी जा सकते हो परंतु सुनो." उसने अशोक को रोका. पूरे शहर में इस तरह की तलाशियां चल रही हैं. यहां से जाने के बाद संभव है तुम उन छु‍िरयों की वजह से किसी और जगह धर लिए जाओ. "
"नहीं इंस्पेक्टर साहब अब मुझ में छुरियां ले जाने की हिम्मत नहीं है. मैं उसे यहीं छोड़ जाता हूँ." अशोक बोला तो इंस्पेक्टर और सिपाही के चेहरे पर विजयी मुस्कान उभर आई.
वे दोनों अपने अपने ब्रेफ मामले उठाकर पुलिस स्टेशन के बाहर आए तो उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्हें नरक से रिहाई का आदेश मिल गया है.

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